May ३०, २०२४ १८:१७ Asia/Kolkata
  • फ़ार्सी भाषा के मशहूर शायर और हकीम मौलवी द्वारा  पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी की विशेषताओं का ख़ुबसूरती के साथ बयान
    फ़ार्सी भाषा के मशहूर शायर और हकीम मौलवी द्वारा पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी की विशेषताओं का ख़ुबसूरती के साथ बयान

पार्सटुडे- प्रसिद्ध ईरानी शायर मौलवी ने "दीवाने शम्स" में अधिकतर इस ओर संकेत किया है कि पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शक्ति व ताक़त ईश्वरीय थी और त्याग व बलिदान देने में वे पैग़म्बरे इस्लाम के साथ एक प्रभावी व महान हस्ती थे।

मशहूर शायर और हकीम मौलवी का नाम "जलालुद्दीन मोहम्मद बल्ख़ी" था और ईरान की सांस्कृतिक सीमा से बाहर उन्हें मौलाना रूमी या मौलवी रूमी के नाम से जाना जाता है और 604 हिजरी क़मरी में उनका जन्म ईरान के पूर्व में स्थित बल्ख़ में हुआ था।

उन्होंने अपनी रचनाओं विशेषकर मस्नवी में पवित्र कुरआन की आयतों, पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिमुस्सलामों की हदीसों और पैग़म्बरों की जीवनी की ओर बहुत संकेत किया है इस प्रकार से कि इस संबंध में कोई भी उनकी बराबरी नहीं कर सकता।

मौलाना की शम्स तबरेज़ी से मुलाक़ात

ईरान के प्रसिद्ध शायर और हकीम मौलवी की ज़िन्दगी की एक सबसे महत्वपूर्ण घटना शम्स तबरेज़ी से लगभग 642 हिजरी क़मरी में मुलाक़ात है। उस समय मौलवी की उम्र लगभग 40 साल थी।

शम्स तबरेज़ी ने मौलाना को इस प्रकार प्रेमी बना दिया कि उन्होंने दर्स व नसीहत सब छोड़ दिया और रहस्यवादी शेरों को सुनना और पढ़ना आरंभ कर दिया। कोई भी सही से नहीं जानता कि शम्स तबरेज़ी ने मौलाना से क्या कहा और क्या सीखा दिया जो मौलाना इस तरह से बदल गये मगर यह बात स्पष्ट है कि शम्स तबरेज़ी विद्वान और दुनिया देखे हुए थे और उनकी रचनायें इस बात की सूचक हैं कि पवित्र क़ुरआन की व्याख्या और रहस्यवाद पर उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी।

मौलवी का प्रभाव ईरान की सांस्कृतिक और पठारी सीमाओं से बाहर तक है। ईरानी, अफ़ग़ानी, ताजिक, तुर्क, यूनानी, मध्य एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया विशेषकर इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलमानों ने गत सात शताब्दियों के दौरान मौलाना रूमी की आध्यात्मिक रचनाओं से बहुत लाभ उठाया है।

मौलवी ने जो शेर कहे हैं वे "सबसे अधिक प्रिय" और "सबसे अधिक बिकने वाली" किताब के नाम से अमेरिका में बिक रहे हैं।

समूचे ईरान में उनकी रचनाओं को बड़े महत्व की दृष्टि से देखा जाता है।

 

दीवाने शम्स में अमीरूल मोमिनीन

प्रसिद्ध शायर मौलवी ने "दीवाने शम्स" में अधिकतर इस ओर संकेत किया है कि पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शक्ति व ताक़त ईश्वरीय थी और त्याग व बलिदान देने में वे पैग़म्बरे इस्लाम के साथ एक प्रभावी व महान हस्ती थे।

इसी प्रकार मौलवी, अपने शेरों में एक संपूर्ण इंसान के रूप में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की विशेषताओं को बयान करते हैं।

आध्यात्मिक मस्नवी में हज़रत अली अलैहिस्सलाम

 

मस्नवी किताब पढ़ने से पता है कि मौलवी कहानी कहने में बहुत माहिर थे और कहानी के बीच में जब वह अत्याचारियों से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मुक़ाबले की किसी कहानी की ओर संकेत करते हैं तो ऐसा जोशीला शेर पढ़ते हैं मानो कहानी बयान करना भूल गये हैं और हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सदगुणों में लीन व भावविभोर हो गये हैं।

हज़रत अली अलैहिस्सलाम को जब रणक्षेत्र में यह अवसर मिलता है कि ज़ुल्म व कुफ्र की सेना का काम समाप्त कर दें तो उनके मुकाबले में आने वाला प्रसिद्ध पहलवान अम्र बिन अब्दउद आप पर थुक देता है। इस पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी तलवार फ़ेंक देते हैं और जंग रोक देते हैं और उसके सीने से उतर जाते हैं ताकि अपने क्रोध को शांत कर सकें और पूरी निष्ठा व सदिच्छा के साथ महान ईश्वर की राह में जेहाद करें न कि अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए।

 

इसके बाद मौलवी अपने दिल की गहराइयों से बहुत अच्छे अंदाज़ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की प्रशंसा करते हैं। इसके बाद मौलवी फ़िर कहानी बयान करने लगते हैं और इस बार हज़रत अलैहिस्सलाम की ज़बान से उनकी शख्सियत को बयान करते हैं। MM

स्रोतः तेहरान, ताहिरा, 1403, मौलवी के शेर में अमीरूल मोमिनीन, मेहरन्यूज़ मौलवी, जलालुद्दीन, दीवाने शम्से मौलवी, मस्नवी मानवी  

 

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