ईरान के अहले-सुन्नत के नेता | अमेरिका की साज़िशों का मुक़ाबला करने का एकमात्र रास्ता इस्लामी दुनिया की एकता है
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पार्स‌टुडे - मजलिस-ए-ख़ुब्रगान-ए-रहबरी में कुर्दिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि ने ज़ोर देकर कहा कि अमेरिका के मानवाधिकार संबंधी दावे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का एक बहाना हैं।
(last modified 2026-01-13T08:15:51+00:00 )
Jan ११, २०२६ ११:३८ Asia/Kolkata
  • कुर्दिस्तान प्रांत के लोगों के प्रतिनिधि-मजलिस-ए-ख़ुब्रगान-ए-रहबरी मामोस्ता फ़ायेक़ रस्तमी
    कुर्दिस्तान प्रांत के लोगों के प्रतिनिधि-मजलिस-ए-ख़ुब्रगान-ए-रहबरी मामोस्ता फ़ायेक़ रस्तमी

पार्स‌टुडे - मजलिस-ए-ख़ुब्रगान-ए-रहबरी में कुर्दिस्तान प्रांत के प्रतिनिधि ने ज़ोर देकर कहा कि अमेरिका के मानवाधिकार संबंधी दावे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का एक बहाना हैं।

मामोस्ता फ़ायेक़ रस्तमी ने यह उल्लेख करते हुए कि वॉशिंगटन के मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संबंधी दावे अन्य देशों के मामलों में दख़ल देने का मुखौटा हैं, कहा कि इस्लामी दुनिया की एकता ही अमेरिका की वर्चस्ववादी नीतियों का मुक़ाबला करने का एकमात्र रास्ता है।

 

पार्स‌टुडे की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने ईरान को बचाने संबंधी ट्रंप के दावों को खोखला और निराधार बताते हुए कहा कि आज अमेरिका का राष्ट्रपति इस देश की वर्चस्ववादी नीतियों का नेतृत्व कर रहा है।

 

मजलिस-ए-जहानी-ए-तक़रीब-ए-मज़ाहिब-ए-इस्लामी की उच्च परिषद के सदस्य ने क्षेत्र में अमेरिका के हस्तक्षेपों के इतिहास की ओर इशारा करते हुए कहा कि अमेरिका वर्षों से अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया, इराक़ और अन्य क्षेत्रों में बहानों के सहारे दख़ल देता रहा है। ईरान की जनता, जो इस्लाम-ए-नाब-ए-मुहम्मदी (स) के आदेशों की पाबंद है, कभी भी अपने देश के आंतरिक मामलों में विदेशियों के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेगी।

 

फूट से लड़ने का सर्वोत्तम मार्ग क़ुरआन करीम और पैग़म्बर-ए-अकरम (स) की सुन्नत से जुड़ाव है

 

असलूये के अहले-सुन्नत इमाम-ए-जुमआ शेख़ इब्राहीम मुहम्मदी ने कहा कि फूट से लड़ने और इस्लाम व मुसलमानों के दुश्मनों की साज़िशों को निष्क्रिय करने का सबसे अच्छा तरीका क़ुरआन करीम और पैग़म्बर-ए-अकरम (स) की सुन्नत से मज़बूती से जुड़े रहना है। उन्होंने कहा कि अहले-सुन्नत की रिवायत के अनुसार रजब की 27 तारीख़ पैग़म्बर की मेराज है और शिया भाइयों की रिवायत के अनुसार यही दिन मबअस है, अंततः ये दोनों अवसर रहमत के पैग़म्बर (स) से संबंधित हैं, जिनका वजूद मुसलमानों के बीच एकता और आपसी सौहार्द को मज़बूत करने का सबसे बड़ा कारण है। mm