सिर्फ सच बोलना ही काफी नहीं; क़ुरआन में बात करने के आदाब पर एक संक्षिप्त नज़र
https://parstoday.ir/hi/news/religion-i146610-सिर्फ_सच_बोलना_ही_काफी_नहीं_क़ुरआन_में_बात_करने_के_आदाब_पर_एक_संक्षिप्त_नज़र
पार्स टुडे – क़ुरआन केवल बात के सच या झूठ को नहीं मापता; लहज़ा, सम्मान, नरमी, प्रभावशीलता, और यहाँ तक कि बात करने का समय और तरीका भी – क़ुरआन की नज़र में – बात करने के नैतिकता का हिस्सा हैं।
(last modified 2026-09-01T13:57:20+00:00 )
Sep ०१, २०२६ १९:२५ Asia/Kolkata
  • क़ुरआन में बात करने के आदाब
    क़ुरआन में बात करने के आदाब

पार्स टुडे – क़ुरआन केवल बात के सच या झूठ को नहीं मापता; लहज़ा, सम्मान, नरमी, प्रभावशीलता, और यहाँ तक कि बात करने का समय और तरीका भी – क़ुरआन की नज़र में – बात करने के नैतिकता का हिस्सा हैं।

हमारे जीवन की बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाएँ कुछ शब्दों से शुरू होती हैं। एक वाक्य किसी को शांत कर सकता है, किसी का दिल तोड़ सकता है, किसी गलतफहमी को दूर कर सकता है, या एक साधारण मतभेद को एक लंबे झगड़े में बदल सकता है। इसलिए, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि क़ुरआन ने बोलने के बारे में इतनी सावधानी के साथ बात की है।

दिलचस्प बात यह है कि क़ुरआन केवल "झूठ मत बोलो" या "अच्छा बोलो" नहीं कहता। बोलने के विभिन्न रूपों के लिए, इसकी अलग-अलग व्याख्याएँ हैं – मानो वह कहना चाहता हो कि सही बोलने की केवल एक ही विशेषता नहीं है। इस लेख में पारस टुडे ने इस महत्वपूर्ण विषय पर एक नज़र डाली है:

क़ुरआन में बोलने के प्रकार

"क़ौलन सदीदा" (قولاً سديداً) – सही, मजबूत और गणना-युक्त बात। वह बात जो जल्दबाजी या आवेग में न कही गई हो। यह व्याख्या आज के समय में – जब लोग कुछ सुनते हैं और उसी क्षण उसे दोबारा पोस्ट कर देते हैं – और भी अधिक अर्थपूर्ण हो गई है।

"क़ौलन मारूफ़ा" (قولاً معروفاً) – उचित और सराहनीय बात। यहाँ केवल बात का सच होना ही मायने नहीं रखता, बल्कि बोलने का तरीका भी महत्वपूर्ण है। कभी-कभी हमारी बात सही हो सकती है, लेकिन हम उसे ऐसे लहज़े में कहते हैं जो सामने वाले का अपमान करता है। क़ुरआन स्पष्ट रूप से ऐसी बात को अच्छा नहीं मानता।

"क़ौलन करीमा" (قولاً كريماً) – इससे भी आगे जाता है; अर्थात लोगों से आदरपूर्वक और सम्मानजनक बात करना। यह व्याख्या दिखाती है कि सम्मान केवल एक बाहरी व्यवहार नहीं है – बल्कि उसे व्यक्ति की भाषा में भी दिखना चाहिए।

"क़ौलन लय्यिना" (قولاً ليناً) – अर्थात नरम बात। महत्वपूर्ण बात यह है कि बोलने में नरमी का अर्थ अपनी बात छोड़ देना या कमज़ोरी नहीं है। एक व्यक्ति असहमत हो सकता है, आलोचना कर सकता है, और यहाँ तक कि गंभीर बात भी कर सकता है – लेकिन फिर भी उसका लहज़ा कठोर और अपमानजनक नहीं होना चाहिए।

"क़ौलन मैसूरा" (قولاً ميسوراً) – एक और अभिव्यक्ति है; अर्थात आसान, शांत करने वाली और सुखद बात। कभी-कभी हम वास्तव में किसी की समस्या का समाधान नहीं कर सकते, लेकिन हम इस तरह बात कर सकते हैं कि कम से कम उनका दर्द न बढ़े।

"क़ौलन बलीग़ा" (قولاً بليغاً) – अर्थात स्पष्ट और प्रभावशाली बात। तो, क़ुरआन की नज़र में, अच्छी बात केवल वह नहीं है जो सही हो; बल्कि उसे सही ढंग से संप्रेषित भी किया जाना चाहिए। शायद यही कारण है कि "अल्लती हिया अहसन" (जो बेहतर हो) और "क़ूलू लिल-नासी हुस्ना" (लोगों से अच्छी बात कहो) जैसी अभिव्यक्तियाँ भी देखने को मिलती हैं – अर्थात, अगर बात कहनी ही है, तो सबसे अच्छे संभव तरीके से कही जानी चाहिए।

 क़ुरआन में गलत बोलने के प्रकार

दूसरी ओर, क़ुरआन में गलत बोलने के लिए भी कई अलग-अलग शब्द हैं:

"क़ौल अज़-ज़ूर" (قول الزور) – असत्य और झूठी बात को संदर्भित करता है।

"अल-इफ़्क" (الإفك) – उस झूठ के करीब है जो सत्य को उलट कर दिखाता है।

"बुह्तान" (بهتان) – वह बदनामी है जो किसी को ऐसी बात का श्रेय देती है जिसका कोई वास्तविक आधार नहीं है।

लेकिन क़ुरआन में सभी भाषिक गलतियाँ झूठ तक सीमित नहीं हैं। "ग़ीबा" (غيبة) – पीठ पीछे चुगली – एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह संभव है कि किसी व्यक्ति के बारे में जो कहा जा रहा है, वह सच हो – लेकिन उसके पीठ पीछे वही बात कहना अभी भी गलत है। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है: जो सच है, वह हमेशा बोलने लायक नहीं होता।

"हम्ज़" (همز) और "लम्ज़" (لمز) – दोष-खोजी, कटाक्ष और अपमान से संबंधित हैं – ऐसी चीज़ें जो कभी-कभी बहुत सामान्य लगती हैं; एक व्यंग्य, एक मज़ाक, एक संक्षिप्त वाक्य। लेकिन यही चीज़ें किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को निशाना बना सकती हैं।

"सुख़रिया" (سخریة) – अर्थात दूसरों का मज़ाक उड़ाना, और "तनाबुज़ बिल-अलक़ाब" (تنابز بالألقاب) – अर्थात लोगों को अपमानजनक उपनामों से पुकारना। क़ुरआन गुप्त बातचीत (النَّجْوَى) के बारे में भी चेतावनी देता है जो पाप, शत्रुता या नुकसान पहुँचाने के लिए होती है – "अन-नज्वा बिल-इस्मि वल-उद्वान" (النَّجْوَى بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ) से।

 निष्कर्ष

यदि हम इन सभी अभिव्यक्तियों को एक साथ रखें, तो एक बात स्पष्ट हो जाती है:क़ुरआन की नज़र में, जीभ (बोली) केवल बात करने का एक साधन नहीं है – यह व्यक्ति की नैतिकता का एक हिस्सा है।

हम क्या कहते हैं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन हम कैसे कहते हैं, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यहाँ तक कि हम किसके बारे में, किस परिस्थिति में और किस उद्देश्य से बात करते हैं – यह सब मायने रखता है।

शायद यही कारण है कि कभी-कभी, कोई बात कहने से पहले – केवल कुछ सेकंड रुकना ही काफी है:क्या यह बात सही है? क्या इसे कहना आवश्यक है? और यदि आवश्यक है, तो क्या इसे थोड़ा बेहतर नहीं कहा जा सकता?  (AK)

 

हमारा व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करने के लिए क्लिक कीजिए

हमारा टेलीग्राम चैनल ज्वाइन कीजिए

हमारा यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब कीजिए!

ट्वीटर पर हमें फ़ालो कीजिए 

फेसबुक पर हमारे पेज को लाइक करें।