May १८, २०२४ २२:३९ Asia/Kolkata
  • ज़ायोनियों में इतनी नफ़रत कहां से आती है?

ज़ायोनी, इतिहास के कड़वे अनुभवों और दूसरे यहूदी पंथों द्वारा ठुकराए जाने की वजह से अपमानित महसूस करते हैं, जिससे दूसरे लोगों और ख़ास तौर पर फ़िलिस्तीनियों के प्रति उनमें नफ़रत और हिंसा का भाव पैदा होता है।

एक राजनीतिक आंदोलन के रूप में ज़ायोनीवाद हमेशा से विवाद में रहा है। हद से ज़्यादा नफ़रत की भावना की वजह से इसने नकारात्मक विचारों को अपनी ओर आकर्षित किया है। इस आंदोलन में नफ़रत की एक वजह, वह विचार हैं जो यहूदियों की रक्षा और यहूदियों के देश की रक्षा से जुड़े हैं।

आंतरिक भेदभाव

ज़ायोनियों के बीच नफ़रत फैलने का एक मुख्य कारण आंतरिक भेदभाव है। यह भेदभाव एक तरह से यहूदी विरोधी भावना और अन्य यहूदियों द्वारा यहूदियों के प्रति भेदभाव के लंबे इतिहास की प्रतिक्रिया है। कुछ ज़ायोनी कड़वे ऐतिहासिक अनुभवों और ख़ुद को श्रेष्ठ मानने वाले अन्य यहूदी गुटों से असुरक्षा की भावना के कारण, हीनता की भावना रखते हैं, जो दूसरों विशेषकर फ़िलिस्तीनियों के प्रति आक्रामक, हिंसक और नफ़रती रवैये में प्रकट होती है। इसके अलावा, यही भावना फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ इस्राईल की आक्रामक और सैन्य नीतियों में भी देखी जा सकती है।

धार्मिक अतिवाद और बाहरी नस्लवाद

ज़ायोनीवाद में नफ़रत की एक और जड़ धार्मिक और नस्लीय श्रेष्ठता में विश्वास है। ज़ायोनीवाद की विचारधारा, विशेष रूप से अपने चरम रूप में, एक प्रकार की धार्मिक और नस्लीय सर्वोच्चता पर आधारित है, जो मानती है कि यहूदी ईश्वर के चुने हुए बंदे हैं और सिर्फ़ उन्हें फ़िलिस्तीन की सरज़मीन और पश्चिम एशिया के एक बड़े हिस्से पर शासन का अधिकार है। इन विश्वासों ने क़ब्ज़ा, रंगभेद और यहां तक ​​कि मानवता के ख़िलाफ़ अपराधों जैसी बुराईयों को जन्म दिया है।

क़ब्जे वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों में अवैध ज़ायोनी बस्तियों का निर्माण और लगातार उनका विस्तार, जिसकी संयुक्त राष्ट्र ने बार-बार निंदा की है, इन नीतियों का एक उदाहरण है। इस तरह की नीतियों से ज़ायोनियों के बीच नफ़रत की जड़ें और मज़बूत होती जा रही हैं।

दुष्प्रचार और झूठा प्रोपैगंडा

मौजूदा नफ़रत की एक वजह, मीडिया और ज़ायोनी संस्थानों द्वारा प्रचार और झूठ फैलाना भी है। सुरक्षा ख़तरों और फ़िलिस्तीनियों की कार्यवाहियों के बारे में झूठा प्रोपैगंडा करके यह मीडिया ज़ायोनियों के हिंसक और दमनकारी कार्यों को उचित ठहराने के साथ-साथ ज़ायोनीवाद के विस्तार की कोशिश करता है। जैसे कि 7 अक्टूबर, 2023 को इस्राईल के ख़िलाफ़ हमास के ऑप्रेशन के बारे में मीडिया ने झूठे दावे किए, जिनकी बाद में पोल भी खुल गई।

सैन्य उद्देश्यों के लिए नफ़रत पैदा की गई

फ़िलिस्तीनी प्रतिरोधी समूहों के ख़िलाफ़ इस्राईल की सैन्य कार्यवाहियों से ज़ायोनीवादियों के बीच नफ़रत बढ़ रही है। सैन्य आक्रामकता, नागरिकों की हत्या, घरों और बुनियादी ढांचे का विनाश और आर्थिक नाकाबंदी इसके उदाहरण हैं। सिर्फ़ ग़ज़ा के ख़िलाफ़ हालिया युद्ध में इस्राईली बमबारी के परिणामस्वरूप 35,000 हज़ार से ज़्यादा फ़िलिस्तीनी शहीद हो गए हैं और ग़ज़ा का महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया है। इसलिए यह माना जाना चाहिए कि इस तरह के सैन्य अपराधों के लिए इस स्तर पर नफ़रत को फैलाया जाता है।

कूटनीति और संवाद को अनदेखा करना

कई मामलों में, यहां तक ​​कि अमरीका और यूरोप में भी, ज़ायोनीवाद ने समस्याओं को हल करने के लिए कूटनीति और वार्ता का रास्ता अपनाने के बजाए, बल और राजनीतिक दबाव का सहारा लिया है। इस ग़ैर-रचनात्मक दृष्टिकोण ने ज़ायोनियों के बीच लगातार घृणित रवैया पैदा करने और तनाव बढ़ाने के अलावा, कई लोगों और पश्चिमी समाजों को यह महसूस कराया है कि ज़ायोनीवाद सिर्फ़ अपने हितों को सुरक्षित रखना चाहता है और दूसरों के अधिकारों और राय की उसे कोई परवाह नहीं है।

संक्षेप में, ज़ायोनीवाद में नफ़रत की जड़ें आंतरिक भेदभाव, धार्मिक और नस्लीय उग्रवाद, प्रोपैगंडा, अत्याचार और कूटनीति और संवाद के अभाव में में खोजी जा सकती हैं। msm

टैग्स