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    <title>ईरानी बुद्धिजीवी-51</title>
    <link>https://parstoday.ir/hi/radio/program--ईर_न_ब_द_ध_ज_व_51</link>
    <description>मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी की गणना फ़ारसी साहित्य के महान साहत्यकारों में होती है।  जलालुद्दीन मुहम्मद, फ़ारसी भाषा के विश्व ख्याति प्राप्त कवि हैं।  उनकी रचनाओं का अनुवाद विश्व की कई भाषाओं में किया जा चुका है।  यही कारण है कि विश्व के कई साहित्यकार, मौलवी के विचारों से प्रभावित रहे हैं।  उन्हें रूमी के नाम से भी जाना जाता है।


जैसाकि आप जानते हैं कि जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी, परिज्ञानी और साधक भी थे।  उनके विचारों को दो पुस्तकों में संकलित किया गया है, दीवाने कबीर और मसनवी।  मसनवी, फ़ार्सी साहित्य का अनूठा ग्रंथ है।  मौलवी की इन पुस्तकों ने विश्व के बहुत से लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया है।  ईरान के इस महान कवि की कविताएं वास्तव में उनके विचारों का प्रतिबिंबन हैं।  शताब्दियां गुज़र जाने के बावजूद मौलवी के विचार आज भी ज़िंदा हैं।  मौलवी की कविताओं और ग़ज़लों में सृष्टि, उसका आरंभ और अंत, संसार से ईश्वर का संबन्ध, मनुष्य से संबन्धित बातें, प्रेम, स्वतंत्रता और मनुष्य तथा ईश्वर के बीच संपर्क के मार्गों जैसे विषय स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।  मौलवी ने अपनी कविताओं में अपने अनुभवों का भी उल्लेख किया है।
ईरान के महान कवि मौलवी की कविताओं की विशेषता उनका नयापन है।  उनकी बातों से सबोधक ऊबता नहीं है क्योंकि उनमें नयापन पाया जाता है।  मौलवी के विचार, पुस्तकें और उनकी व्यापक सोच, फ़ारसी भाषा तथा साहित्य में रुचि रखने वालों के मध्य व्यापक रूप से फैले और इन्होंने शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को अपनी ओर आकृष्ट किया।
मौलवी ने स्वयं को काल के बंधनों से मुक्त रखा है।  विशेषज्ञों का कहना है कि मौलवी के संकलन को काल के बंधन में बांधा नहीं जा सकता।  यही कारण है कि उनकी रचनाओं में नयापन पाया जाता है।  नएपन के अतिरिक्त मौलवी की रचना सदाबहार है।  इन्ही बातों के दृष्टिगत मौलवी के मानने वालों की संख्या में कमी नहीं होती।  जानकारों का कहना है कि मौलवी ने स्वयं को ईश्वर से जोड़ रखा था इसलिए उन्होंने ईश्वरीय पहचान के बारे में जो बातें कही हैं उसे सुनकर संबोधक उनसे प्रभावित होता है।



तत्कालीन शोधकर्ता और जानेमाने साहित्यकार, डा. ज़र्रीनकूब का कहना है कि मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी की रचनाओं के ताज़ापन का एक कारण उनकी सोच का व्यापक एवं विस्तृत होना है।  यह बात ज़र्रीनकूब ने मौलाना पर किये अपने शोध में कही है।
मौलवी की ग़ज़लों में विशेष प्रकार की लय पायी जाता है।  मौलवी ने अपने शेर, वास्तव में विचारों की दुनिया में डूबकर कहे हैं।  यह ऐसी स्थिति है जिसमें कवि, कविता के मूल नियमों की ओर ध्यान न देकर विचारों में डूब जाता है।  इस स्थिति में जो कविता कही जाती है वह संबोधक को बहुत अधिक प्रभावित करती है।  इसका कारण यह होता है कि ऐसे में मन की बात कह रहा होता है।
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी की कविता की एक अन्य विशेषता यह है कि उन्होंने शब्दों का प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार किया है न कि कविता की परंपरा का अनुसरण करते हुए।  कभी-कभी तो मौलवी अपनी बात कहने के लिए कविता में नए सिंटेक्स या वाक्य विशलेषण का प्रयोग है।  एक शोध के अनुसार मौलवी की कविताओं में कम से कम 75 हज़ार नए सिंटेक्स या वाक्य-विशलेषणों का प्रयोग मिलता है।  इनको स्वयं मौलाना ने बनाया है जिससे उनकी वैचारिक योग्यता का पता चलता है।  इससे पता चलता है कि मौलवी को किस सीमा तक फ़ार्सी भाषा का ज्ञान था।  मौलवी की कविताओं पर शोध करने वाले भारतीय उप महाद्वीप के एक शोधकर्ता का कहना है कि मौलवी द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नई बातें उनके गहन चिंतन का परिणाम हैं।



बहुत से कवियों और अपने समकालीन साहित्यकारों के विपरीत मौलवी ने स्वयं को प्रचलित शब्दों आडंबर से सुरक्षित रखते हुए भाषा में नए शब्दों का समावेश किया है ताकि उनका साहित्य, प्रवाहित नदी की भांति आगे बढ़ती रहे।  उनकी भाषा सरल और आसानी से समझ में आने वाली है।  मौलवी का मानना था कि भाषा वास्तव में बात को समझने और समझाने का माध्यम है इसलिए उस भाषा का प्रयोग किया जाए जिसे समझने में आसानी हो।  मौलवी का यही विचार उनके साहित्य के आजतक जीवित रहने और लोगों को प्रभावित करने का कारण है।
डा. सीरूस शमीसा का मानना है कि मौलवी की कविताओं में सच्चाई पाई जाती है।  उनकी कविताओं को सुनने वाला आसानी से कवि की बातों को समझ सकता है।  मौलवी की कविताओं और शेरों का अध्ययन करने के बाद इस बात को समझा जा सकता है कि वे शायरी में प्राचीन पारंपरिक नियमों के प्रयोग को पसंद नहीं करते थे।  उन्होंने सदैव ही नई शैली अपनाई।  उनके शेरों की एक विशेषता उनका नयापन है।  दूसरे शब्दों में जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी को शायरी की नई शैली का जनक भी कहा जा सकता है।
फ़ेसबुक पर हमें लाइक करें, क्लिक करें</description>
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जैसाकि आप जानते हैं कि जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी, परिज्ञानी और साधक भी थे।  उनके विचारों को दो पुस्तकों में संकलित किया गया है, दीवाने कबीर और मसनवी।  मसनवी, फ़ार्सी साहित्य का अनूठा ग्रंथ है।  मौलवी की इन पुस्तकों ने विश्व के बहुत से लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया है।  ईरान के इस महान कवि की कविताएं वास्तव में उनके विचारों का प्रतिबिंबन हैं।  शताब्दियां गुज़र जाने के बावजूद मौलवी के विचार आज भी ज़िंदा हैं।  मौलवी की कविताओं और ग़ज़लों में सृष्टि, उसका आरंभ और अंत, संसार से ईश्वर का संबन्ध, मनुष्य से संबन्धित बातें, प्रेम, स्वतंत्रता और मनुष्य तथा ईश्वर के बीच संपर्क के मार्गों जैसे विषय स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।  मौलवी ने अपनी कविताओं में अपने अनुभवों का भी उल्लेख किया है।
ईरान के महान कवि मौलवी की कविताओं की विशेषता उनका नयापन है।  उनकी बातों से सबोधक ऊबता नहीं है क्योंकि उनमें नयापन पाया जाता है।  मौलवी के विचार, पुस्तकें और उनकी व्यापक सोच, फ़ारसी भाषा तथा साहित्य में रुचि रखने वालों के मध्य व्यापक रूप से फैले और इन्होंने शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को अपनी ओर आकृष्ट किया।
मौलवी ने स्वयं को काल के बंधनों से मुक्त रखा है।  विशेषज्ञों का कहना है कि मौलवी के संकलन को काल के बंधन में बांधा नहीं जा सकता।  यही कारण है कि उनकी रचनाओं में नयापन पाया जाता है।  नएपन के अतिरिक्त मौलवी की रचना सदाबहार है।  इन्ही बातों के दृष्टिगत मौलवी के मानने वालों की संख्या में कमी नहीं होती।  जानकारों का कहना है कि मौलवी ने स्वयं को ईश्वर से जोड़ रखा था इसलिए उन्होंने ईश्वरीय पहचान के बारे में जो बातें कही हैं उसे सुनकर संबोधक उनसे प्रभावित होता है।



तत्कालीन शोधकर्ता और जानेमाने साहित्यकार, डा. ज़र्रीनकूब का कहना है कि मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी की रचनाओं के ताज़ापन का एक कारण उनकी सोच का व्यापक एवं विस्तृत होना है।  यह बात ज़र्रीनकूब ने मौलाना पर किये अपने शोध में कही है।
मौलवी की ग़ज़लों में विशेष प्रकार की लय पायी जाता है।  मौलवी ने अपने शेर, वास्तव में विचारों की दुनिया में डूबकर कहे हैं।  यह ऐसी स्थिति है जिसमें कवि, कविता के मूल नियमों की ओर ध्यान न देकर विचारों में डूब जाता है।  इस स्थिति में जो कविता कही जाती है वह संबोधक को बहुत अधिक प्रभावित करती है।  इसका कारण यह होता है कि ऐसे में मन की बात कह रहा होता है।
मौलाना जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी की कविता की एक अन्य विशेषता यह है कि उन्होंने शब्दों का प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार किया है न कि कविता की परंपरा का अनुसरण करते हुए।  कभी-कभी तो मौलवी अपनी बात कहने के लिए कविता में नए सिंटेक्स या वाक्य विशलेषण का प्रयोग है।  एक शोध के अनुसार मौलवी की कविताओं में कम से कम 75 हज़ार नए सिंटेक्स या वाक्य-विशलेषणों का प्रयोग मिलता है।  इनको स्वयं मौलाना ने बनाया है जिससे उनकी वैचारिक योग्यता का पता चलता है।  इससे पता चलता है कि मौलवी को किस सीमा तक फ़ार्सी भाषा का ज्ञान था।  मौलवी की कविताओं पर शोध करने वाले भारतीय उप महाद्वीप के एक शोधकर्ता का कहना है कि मौलवी द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली नई बातें उनके गहन चिंतन का परिणाम हैं।



बहुत से कवियों और अपने समकालीन साहित्यकारों के विपरीत मौलवी ने स्वयं को प्रचलित शब्दों आडंबर से सुरक्षित रखते हुए भाषा में नए शब्दों का समावेश किया है ताकि उनका साहित्य, प्रवाहित नदी की भांति आगे बढ़ती रहे।  उनकी भाषा सरल और आसानी से समझ में आने वाली है।  मौलवी का मानना था कि भाषा वास्तव में बात को समझने और समझाने का माध्यम है इसलिए उस भाषा का प्रयोग किया जाए जिसे समझने में आसानी हो।  मौलवी का यही विचार उनके साहित्य के आजतक जीवित रहने और लोगों को प्रभावित करने का कारण है।
डा. सीरूस शमीसा का मानना है कि मौलवी की कविताओं में सच्चाई पाई जाती है।  उनकी कविताओं को सुनने वाला आसानी से कवि की बातों को समझ सकता है।  मौलवी की कविताओं और शेरों का अध्ययन करने के बाद इस बात को समझा जा सकता है कि वे शायरी में प्राचीन पारंपरिक नियमों के प्रयोग को पसंद नहीं करते थे।  उन्होंने सदैव ही नई शैली अपनाई।  उनके शेरों की एक विशेषता उनका नयापन है।  दूसरे शब्दों में जलालुद्दीन मुहम्मद मौलवी को शायरी की नई शैली का जनक भी कहा जा सकता है।
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        <title>ईरानी बुद्धिजीवी-45</title>
        <description>अनवरी अबीवर्दी ईरान के सांस्कृतिक प्रभाव वाले क्षेत्र में रहते थे।</description>
        <itunes:subtitle>अनवरी अबीवर्दी ईरान के सांस्कृतिक प्रभाव वाले क्षेत्र में रहते थे।</itunes:subtitle>
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        <pubDate>Tue, 15 Dec 2015 02:55:23 GMT</pubDate>
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