Feb १४, २०२४ १९:३४ Asia/Kolkata
  • इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के जन्म दिवस के शुभ अवसर पर विशेष कार्यक्रम

दोस्तो जैसाकि आप जानते हैं कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बेटे हैं और सन 38 हिजरी कमरी में पवित्र नगर मदीना में आपका जन्म हुआ था।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम बहुत ज्यादा सज्दा करते और महान ईश्वर की इबादत करते थे इसलिए उनकी सबसे प्रसिद्ध उपाधि सज्जाद और ज़ैनुल आबेदीन है और इमाम की यही उपाधियां सबसे अधिक मशहूर हैं।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम हर चीज़ से पहले इमाम हैं। दूसरे शब्दों में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जिनके बारे में आयते तत्हीर नाज़िल हुई है। यहां कोई यह सवाल कर सकता है कि आयते तत्हीर उस समय नाज़िल हुई थी जब इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम का जन्म भी नहीं हुआ था? इसका जवाब यह है कि आयते तत्हीर केवल एक या दो इमामों के बारे में नाज़िल नहीं है बल्कि इसमें 14 मासूम शामिल हैं और इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम उनमें से एक हैं।

पैग़म्बरे इस्लाम ने अपने जीवन के अंतिम समय में फरमाया था कि मैं तुम लोगों के बीच में दो मूल्यवान चीज़ें छोड़कर जा रहा हूं एक अल्लाह की किताब और दूसरे अपने अहलेबैत। यह दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होंगे और जब तक तुम इन दोनों से जुड़ो रहोगे हरगिज़ गुमराह नहीं होगे यहां तक कि दोनों एक साथ हौज़े कौसर पर मेरे पास आयेंगे। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम वह महान हस्ती हैं जो पैग़म्बरे इस्लाम की इस हदीस में शामिल हैं। यानी जो इंसान कुरआन और अहलेबैत अलैहिस्सुलाम से जुड़ा रहेगा वह कभी भी गुमराह नहीं होगा।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हर नबी और हर इमाम हर प्रकार के छोटे और बड़े गुनाह से पाक होता है। वह अनजाने में भी गुनाह नहीं करता है। उसकी वजह यह है कि अगर नबी या इमाम भी गुनाह करते तो दूसरे लोग पूरे विश्वास और यक़ीन के साथ उनके हर कार्य का अनुसरण नहीं करते जबकि महान ईश्वर ने उन्हें भेजा ही इसलिए है कि लोग किसी प्रकार के न नकूर के बिना उनका अनुसरण करें।

सारांश यह कि महान ईश्वर ने नबी और इमाम को हर प्रकार के गुनाह से पवित्र बनाया है ताकि दूसरे लोग किसी प्रकार की चूं- चेरा के बिना उनका अनुपालन व अनुसरण करें।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम इस्लाम की बहुत सी शिक्षाओं को प्रार्थना व दुआ के माध्यम से भी ब्यान करते थे।  उनकी दुआओं के संकलन को “सहीफ़ए सज्जादिया” के नाम से जाना जाता है।  कर्बला की अमर घटना को जीवित रखने और उसे विश्व वासियों तक पहुंचाने में इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम की महत्वपूर्ण भूमिका है।  कर्बला की अमर घटना को सार्वजनिक करने में इमाम सज्जाद अग्रणी रहे हैं।  एक बार एक व्यक्ति ने इमाम से कहा कि आप बहुत रोते हैं आप कब तक रोयेंगे? क्या आपके दुख का अंत नहीं है?  उस व्यक्ति के जवाब में इमाम सज्जाद ने फरमाया ईश्वर के दूत हज़रत याक़ूब के 12 बेटों में से केवल एक बेटा खो गया था।  अपने एक बेटे यूसुफ़ के वियोग में हज़रत याक़ूब इतना रोए कि उनकी आखें सफेद हो गई थीं जबकि हज़रत याकूब को पता था कि यूसुफ़ जिन्दा हैं जबकि मैंने अपने पिता, अपने चाचा और भाइयों के शवों को देखा है जो जलती हुई ज़मीन पर पड़े थे।  अब यह बताओ कि यह कैसे संभव है कि मेरा दुःख शीघ्र समाप्त हो जाए?

 करबला की दुखद घटना के घटने के बाद लोगों की  समझ में यह बात आ गई थी कि उमवी शासक विशेषकर मोआविया का पुत्र यज़ीद, अपनी सत्ता को बचाने के लिए कुछ भी कर सकता है क्योंकि उसने पैग़म्बरे इस्लाम के प्राणप्रिय नवासे इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके वफादार साथियों को तीन दिन का भूखा - प्यासा कर्बला में शहीद करवा दिया। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने जब अपना एतिहासिक आंदोलन आरंभ किया तो कहा था कि मैं अपने नाना और बाबा की उम्मत में सुधार के लिए आंदोलन कर रहा हूं। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने भी अपने पिता के मार्ग व संदेश को लोगों तक पहुंचाने का मिशन जारी रखा।

शम्सुद्दीन ज़हबी अहले सुन्नत के एक प्रसिद्ध विद्वान हैं। वह इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के बारे में कहते हैं कि अली बिन हुसैन अर्थात इमाम ज़ैनुल आदेबीन अलैहिस्सलाम का अजीब रोब था और ईश्वर की सौगंध! वह इसके योग्य व पात्र थे कि एसा हो। वह सदगुणों से सुसज्जित थे जिसकी वजह से वह इमामत के लाएक थे। इसी प्रकार अहले सुन्नत के एक अन्य विद्वान हाफिज़ अबू नईम इस्फहानी कहते हैं अली बिन हुसैन बिन इब्ने अबी तालिब उपासकों की शोभा और चेराग़ थे वह वफादार और महादानी थे।

इमामों की एक विशेषता यह थी कि हर इमाम अपने समय की परिस्थिति को ध्यान में रखकर लोगों का मार्गदर्शन करता था। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के काल में घुटन का माहौल था। लोगों का मार्गदर्शन बहुत कठिन कार्य था इसलिए इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए महान ईश्वर से दुआ की शैली अपनाई और दोआओं के माध्यम से लोगों का मार्गदर्शन करते।

दुआ महान ईश्वर से संपर्क का बेहतरीन साधन है। दुआ के ज़रिये इंसान अपने दिल की बात अपने पालनहार से करता है। दुआ संपर्क का वह साधन है जो इंसान को अपने पालनहार से जोड़ देती है। दुआ इंसान को मूल्य व महत्व प्रदान करती है। महान ईश्वर पवित्र कुरआन में पैग़म्बरे इस्लाम से कहता है हे पैग़म्बर कह दीजिये कि अगर तुम्हारी दुआ न होती तो ईश्वर के निकट तुम्हारा कोई महत्व ही न होता।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम दुआ के बारे में फरमाते हैं दुआ तीन हालतों से खाली नहीं है या उसके कबूल होने को रोक लिया जाता है या उसे कबूल कर लिया जाता है या जो मुसीबत आने वाली होती है वह दुआ के माध्यम से टल जाती है। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अधिकांश दुआयें नमाज़ के समय करते थे।

अबू हमज़ा सोमाली कहते हैं कि मैंने देखा कि इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम मस्जिदे कूफा में दाखिल हुए और मस्जिद के सातवें स्तंभ के पास उन्होंने अपने जूते को उतारा और नमाज़ पढ़ने के लिए तैयार हो गये। अपने दोनों हाथों को कान तक उपर उठाया और उसके बाद तकबीर यानी अल्लाहो अकबर कहा। जब मैंने इमाम के मुंह से तकबीर की आवाज़ सुनी तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये और जब इमाम नमाज़ पढ़ने लगे तो उनके पढ़ने का अंदाज़ बड़ा ही मनोरम व मनोहर था। इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि नमाज़ में इंसान महान ईश्वर के सामने खड़ा होता है। नमाज़ महान ईश्वर की बारगाह में दाखिल होने का एक तरीका है।

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि बड़े व प्रतिष्ठित लोगों के मुकाबले में खड़ा होने का अपना एक विशेष तरीका होता है तो महान ईश्वर के मुकाबले में खड़ा होना इससे अपवाद नहीं है। कितनी अच्छी बात है कि जब इंसान महान ईश्वर व अपने पालनहार की बारगाह में खड़ा हो तो वह पवित्र हो और पूरी तनमयता व निष्ठा के साथ खड़ा हो और यह सोचे कि उसने कितना गुनाह किया है उसके गुनाहों की सही संख्या केवल महान ईश्वर जानता है। सब कुछ जानने व देखने के बावजूद इंसान उसकी असीमित कृपा से लाभ उठाता रहता है।

इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम परोक्ष और अपरोक्षरूप से इंसान को नमाज़ पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और इंसान की ज़िन्दगी में उसकी भूमिका को बयान करते हैं। इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम फरमाते हैं हे मेरे पालनहार मोहम्मद और उनके पवित्र परिजनों पर दुरूद व सलाम भेज और हमें उसमें यानी रमज़ान के पवित्र महीने में उन लोगों में करार दे जो उसके दर्जे को प्राप्त कर चुके हों।  

कुछ लोग सवाल करते हैं कि इमाम, मासूम, नबी और अल्लाह के खास बंदे जब दुआ करते या नमाज़ पढ़ते थे तो उनकी विशेष प्रकार की हालत क्यों हो जाती थी? जबकि वे अल्लाह के खास बंदे होते थे? इस सवाल के जवाब में कहना चाहिये कि जब महान हस्तियां समूचे ब्रह्मांड के रचयिता के सामने खड़ी होती हैं तो वे महान ईश्वर के मुकाबले में स्वयं को तुच्छ व पस्त समझने लगती हैं और महान ईश्वर की याद से गाफिल होने को अपने लिए पाप व गुनाह समझती हैं।

ताऊस नाम के एक प्रसिद्ध धर्मशास्त्री थे। उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम के उन अनुयाइयों को देखा था जिन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम को देखा था। वह खुद बहुत बड़े उपासक थे वह कहते हैं जब भी मैं एहसास करता था कि मेरे अंदर उपासना की भावना कम हो रही है अगर उस समय मैं पवित्र नगर मदीना में होता था तो मस्जिदे नबी जाता था और अगर पवित्र नगर मक्का में होता था तो खानये काबा में जाता था वहां इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्लाम को महान ईश्वर की उपासना करते देखता था और मेरा दिल अपने पालनहार से बात करने के लिए कहता था। वहां मैं बहुत देर तक इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम को उपासना करते हुए देखता था।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के बेटे और मुसलमानों के पांचवें इमाम हैं। वह अपने पिता इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के बारे में फरमाते हैं प्रतिदिन जब थोड़ी रात गुज़र जाती थी और घर के लोग सो जाते थे तो मेरे पिता वुज़ू करते और दो रकअत नमाज़ पढ़ते थे। उसके बाद घर में जो कुछ खाने का सामान व गल्ला होता था उसे इकट्ठा करके एक थैले में डालते थे। उसके बाद उसे कंधे पर रखकर घर से बाहर निकलते और गरीबों के घरों की ओर जाते थे और थैले में मौजूद खाने पीने की चीजों को गरीबों व दरिद्रों में बांटते थे और कोई उन्हें पहचानता भी नहीं था। गरीब लोग केवल इतना जानते थे कि कोई आया है जो उनके बीच चीज़ें बांट रहा है। गरीब व दरिद्र लोग हर रात को इमाम की प्रतीक्षा में रहते थे और अपने घरों का दरवाज़ा खुला रखते थे ताकि इमाम उनका हिस्सा उनके दरवाजों पर रख दें।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम फरमाते हैं कि मेरे पिता इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम के कांधों और पीठ पर जो निशान और घट्ठे पड़ गये थे वे रातों को गरीबों के लिए गल्ले और खाने पीने की चीजों के ढ़ोने की वजह से थे।

रिवायतों में है कि एक बार इमाम जाफर सादिक अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ अनुयाइयों के मध्य इस प्रकार फरमाया एक दिन इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम अपने घर में बैठे हुए थे कि अचानक देखा कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है। उसके बाद इमाम ने अपनी दासी से कहा कि जाओ देखो कौन है? जब दासी दरवाज़े पर आयी तो उसने पूछा कि कौन है जो दरवाज़ा खटखटा रहा है? दरवाज़ा खटखटाने वालों ने कहा कि हम इमाम के शीया हैं। दासी लौटकर आयी और इमाम से कहा कि आपके कुछ शीया हैं तो इमाम तेज़ी से दरवाज़े पर आये और दरवाज़ा खोला पर जैसे ही दरवाज़ा खोला और आने वालों के चेहरों पर नज़र डाली तो दुःखी होकर सिर झुकाकर वापस लौट गये और फरमाया इन लोगों ने झूठ कहा है कि हम आपके शीया हैं क्योंकि इनके चेहरों पर प्रतिष्ठा और ईमान का तेज़ दिखाई नहीं दे रहा है! इसी प्रकार उनके शरीरों से न तो उपासना के चिन्ह स्पष्ट हैं और न ही उनके माथों पर सज्दों के निशान हैं। इसके बाद इमाम ज़ैनुल आबेदीन अलैहिस्सलाम ने फरमाया हमारे शियों की कुछ अलामते हैं जिनसे वे पहचाने जाते हैं। अधिक सज्जा करने की वजह से उनके माथे पर सज्दे के निशान होते हैं और महान ईश्वर की उपासना करने की वजह से उनके चेहरों पर विशेष प्रकार का प्रकाश होता है। MM

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