भारत और चीन को अमरीका की चालों से होशियार रहना चाहिए
भारतीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लद्दाख़ में चीन से मिलने वाली सीमा पर चीन के बढ़ते अतिक्रमण के चलते, भारत की वायुसेना ने लड़ाकू विमानों के लिए अलर्ट जारी कर दिया है।
इससे पहले 2020 में पूर्वी लद्दाख़ में भारत और चीन के बीच गतिरोध की स्थिति बन गई थी, जिसने बाद में हिंसक रूप ले लिया था। 15 जून 2020 को चीनी सैनिकों के साथ हाथापई में 20 भारतीय सैनिकों की मौत हो गई थी।
कमांडर स्तर की कई वार्ताओं के बाद भी चीन के साथ ये मसला पूरी तरह नहीं सुलझा है। इस गतिरोध के कारण कई चीनी ऐप पर भी भारत ने प्रतिबंध लगा दिया था।
भारतीय कंपनियों पर चीनी कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकने के लिए और कोरोना महामारी के दौरान आर्थिक स्थिति का फ़ायदा उठाने की आशंका के चलते भारत सरकार ने 18 अप्रैल 2020 को एफ़डीआई नीति में बदलाव किया था।
दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले दोनों देशों के बीच सीमा पर जारी गतिरोध के बावजूद, भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध अब तक के उच्चतम स्तर पर हैं।
भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज़ करते हुए कहा था, एक ओर जहां भारत और चीन की सेनाएं एक-दूसरे के सामने हथियार लिए खड़ी हैं, वहीं मोदी दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध बढ़ा रहे हैं।
यहां यह कहा जा सकता है कि राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के बावजूद, दोनों देश सैन्य टकराव से होने वाले नुक़सान का अर्थ बख़ूबी समझते हैं, इसीलिए दोनों का यही प्रयास होता है कि सीमा पर तनाव नहीं बढ़ने पाए। लेकिन अमरीका जैसी प्रभावशाली शक्तियों के प्रभाव में स्थिति बिगड़ती जा रही है और दोनों देशों के अधिकारियों के बीच बदगुमानी फैलती जा रही है। सुरक्षा गठबंधन के गठन के बहाने अमरीका और उसके यूरोपीय सहयोगी इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत चीन के लिए चुनौतियां उत्पन्न करना चाहते हैं, ताकि भारत को उसके मुक़ाबले में खड़ा करके आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में चीन की प्रगति को रोका जा सके। भारत भी इस रणनीति को अच्छी तरह समझता है। जैसा कि भारतीय विदेश मंत्री ने इस संदर्भ में कहा थाः पश्चिम को अपनी इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा कि उसकी समस्या, पूरी दुनिया की समस्या है, लेकिन दुनिया की समस्या उसकी समस्या नहीं है।
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह का कहना हैः भारत को ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है कि वह चीन का दुश्मन बन जाए, बल्कि बेहतर यह होगा कि वह चीन का सहयोगी बन जाए और विशेष मामलों में उसके सहयोगी के तौर पर व्यवहार करे।