सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से जाति सर्वेक्षण का डेटा मांग लिया
भारत सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार को अपने जाति सर्वेक्षण डेटा का विवरण सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है ताकि असंतुष्ट लोग निष्कर्षों को चुनौती दे सकें।
रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने अंतरिम राहत के लिए याचिकाकर्ताओं की याचिका को अस्वीकार कर दिया।
याचिकाकर्ताओं ने सर्वेक्षण और पटना हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी जिसने इस तरह की कवायद करने के बिहार सरकार के कदम को बरकरार रखा था।
पीठ ने कहा कि अंतरिम राहत का कोई सवाल ही नहीं है क्योंकि सरकार के पक्ष में उच्च न्यायालय का आदेश है, अब जब डेटा सार्वजनिक मंच पर डाल दिया गया है, तो दो-तीन पहलू बचे हैं, पहला क़ानूनी मुद्दा है, हाईकोर्ट के फैसले का औचित्य और इस तरह की कवायद की वैधता के बारे में।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अदालत के ध्यान में लाया कि अधिकारियों ने पहले ही सर्वेक्षण निष्कर्षों को लागू करना शुरू कर दिया है क्योंकि डेटा पहले ही सामने आ चुका है।
इस पर अदालत ने कहा कि आरक्षण में वृद्धि के मामले को पटना उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जानी चाहिए, पूरे मामले की विस्तार से सुनवाई की ज़रूरत है।
राज्य में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी नीतीश कुमार सरकार पर जाति सर्वेक्षण कराने में अनियमितताओं का आरोप लगाती रही है और एकत्र किए गए आंकड़ों को ‘फर्जी’ बताती रही है।
ज्ञात हो कि बिहार सरकार ने बीते 2 अक्टूबर को जाति सर्वेक्षण के आंकड़े जारी किए थे, जिसके अनुसार, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) राज्य की कुल आबादी का 63 प्रतिशत है, जिसमें अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) सबसे बड़ा हिस्सा (36%) है. आंकड़ों के अनुसार, बिहार की कुल आबादी 13 करोड़ से ज्यादा है, जिसमें पिछड़ा वर्ग 27.13 फीसदी है, अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01 फीसदी और सामान्य वर्ग 15.52 फीसदी है। (AK)