मुस्लिम नाटो - साम्राज्यवाद का नया हथियार।
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ये 2 शब्द "मुस्लिम नाटो" सुन कर शायद आप अचरज में पड़ गए हों की आखिर ये क्या है?
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan २४, २०१७ १४:२७ Asia/Kolkata
  • मुस्लिम नाटो - साम्राज्यवाद का नया हथियार।

ये 2 शब्द "मुस्लिम नाटो" सुन कर शायद आप अचरज में पड़ गए हों की आखिर ये क्या है?

अभी 39 मुस्लिम देशों ने मिल कर एक नया सैन्य संगठन बनाया है जिसका नाम है "इस्लामिक अलायन्स टू फाइट अगेंस्ट टेररिज़्म" लेकिन उसके उद्देश्यों को जानकर इसे अगर "मुस्लिम नाटो" बोला जाये तो यह ग़लत नहीं होगा क्योंकि इसका उद्देश्य भी वही है जो नाटो का है।

यह संगठन भी नाटो की तरह ग़रीब मुल्कों के शोषण और साम्राज्यवादी नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए बनाया गया है। हमारा मानना है कि यह संगठन नाटो से भी ज़्यादा ख़तरनाक साबित होगा अगर यह हक़ीक़त बनता है तो। 


हमे इस संगठन के बनने के पीछे की कहानी को समझना थोड़ा ज़रुरी है। इस संगठन की पहली बार बात 2015 के आख़िर में सामने आई। ज्ञात रहे की 2015 के आख़िर तक ये साफ़ हो गया था कि सीरिया में सऊदी अरब समर्थित आतंकवादियों को बुरी हार झेलनी पड़ेगी और दूसरी तरफ़ यमनी लोगों के साहस के सामने सऊदी सैनिक मैदान छोड़ के भाग रहे थे। तो उस समय सऊदी अरब को बचाये रखने के लिए इस संगठन "मुस्लिम नाटो" की आधारशिला रखी गयी। 


इस संगठन की 3 चीज़ें बड़ी ही हैरान करने वाली हैं। सबसे पहली यह की ये संगठन आतंकवाद से लड़ने की बात करता है लेकिन आतंकवाद से सबसे बुरी तरह प्रभावित दो देश इराक़ और सीरिया को इसमें शामिल नहीं किया गया, तो किस तरह से ये आतंकवाद से लड़ने की बात कर रहा है? ईरान को भी इस संगठन में शामिल नहीं किया गया है, इस वजह से यह एक सुन्नी देशों का संगठन नज़र आता है जिसका असली मक़सद मुस्लिम देशों को शिया बनाम सुन्नी में बाँटना है। इस संगठन के निर्माण के बाद इसके सदस्य देशों में यह शिया बनाम सुन्नी की लड़ाई अब और भी ज़्यादा तेज़ होगी। 
दूसरी बात इस संगठन का हेडक्वार्टर सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ में बनाया गया है और इस संगठन की आर्थिक ज़रूरतें भी सऊदी अरब द्वारा ही पूरी की जाएँगी। इस बात से यह बात निश्चित है कि जिस सऊदी अरब ने परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर दुनिया के अधिकतर आतंकवादियों को समर्थन दिया, वही सऊदी अरब अपनी राजधानी में एक संगठन का हेडक्वार्टर बना के अब उन्हीं आतंकवादियों से लड़ने की बात कर रहा है जिन्हें उसने खुद पाला पोसा है। बाकि सदस्य देशों का इस संगठन के उद्देश्यों और नीतियों पर कंट्रोल न के बराबर होगा जिन परिस्थितियों में और जिन तरीक़ों से इसका निर्माण हो रहा है। 


तीसरा अहम बिंदु ये है कि पूर्व पाकिस्तानी आर्मी चीफ़ रिटायर्ड जनरल राहिल शरीफ़ को इस संगठन का पहला कमांडर नियुक्त किया गया है, यह बात हज़म नहीं होती कि लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और हिज़्बुल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठनों को बनाने वाली पाकिस्तानी आर्मी का पूर्व चीफ़ अब आतंकवादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई का नेतृत्व करेगा।

जिस पाकिस्तानी सेना की मुम्बई हमले में संलिप्तता थी, उस पाकिस्तानी सेना का पूर्व चीफ़ आतंकवाद से लड़ने की बात करे तो यह बात असम्भव लगती है। 
यह संगठन आतंकियों के ख़िलाफ़ लड़ने वाला संगठन प्रतीत ना हो कर बल्कि एक आतंकवादियों का समर्थन करने वाला संगठन प्रतीत हो रहा है। यह संगठन सऊदी अरब की वहाबी नीतियों की पूर्ति के लिए बनाया हुआ संगठन मात्र है।

      

                                                लेखक अभिमन्यु कोहर

                         (लेखक के निजी विचार हैं, पार्स टूडे का सहमत होना ज़रूरी नहीं। )