मुंशी नवल किशोर, महान और दिलचस्प व्यक्तित्व, सेवा और योगदान की मूरत
भारत के दिल्ली विश्व विद्यालय में ईरान, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, ब्रिटेन और क़ज़ाक़िस्तान जैसे देशों के फ़ार्सी भाषा के प्रोफ़ेसरों की उपस्थित में फ़ारसी साहित्य और भाषा के विस्तार में मुंशी नवल किशोर की भूमिका पर एक सेमिनार आयोजति हुआ। इस सेमिनार के आयोजन का लक्ष्य, दुनिया को यह बताना है कि फ़ार्सी भाषा के विस्तार में नवल किशोर की क्या भूमिका रही है।
मुंशी नवल किशोर के व्यक्तित्व और सेवाओं पर एक संक्षिप्त नज़र
मुंशी नवल किशोर एक व्यक्ति नहीं बल्कि एक संपूर्ण संस्कृति का नाम है। मुंशी नवल किशोर ने एक प्रकाशक के रूप में हिंदी-उर्दू-अरबी-फ़ारसी जैसी भाषाओं की अतुल्स सेवा की।
मुंशी नवल किशोर की का जन्म 3 जनवरी 1836 को मथुरा जिले के एक छोटे से गांव रेड़हा में हुआ। यह उनका नानिहाल था। मां का नाम यशोदा देवी और पिता पंडित यमुना प्रसाद भार्गव थे। पंडित यमुना प्रसाद अलीगढ़ के गांव सासनी के एक संपन्न ज़मींदार थे। उनके पूर्वजों का भी अपने-अपने दौर में समाज में महत्वपूर्ण स्थान रहा। यमुना प्रसाद और उनके पिता पंडित बालमुकुंद संस्कृत के पंडितों में गिने जाते थे।
नवल किशोर के शुरूआती साल अपने ननिहाल रेड़हा में ही बीते। छह साल की उम्र में पिता ने अपने पास सासनी में बुला लिया। 14 साल की उम्र में उनका विवाह सरस्वती देवी से हो गया। इस विवाह का उन्होने जीवन भर निर्वाह तो किया लेकिन एक जगह आकर उन्होंने एक मुस्लिम महिला से भी शादी कर ली थी। इस दूसरी बीवी को बेग़म साहिबा की तरह जाना जाता था। सरस्वती देवी से उनकी छह संतानें थीं पांच बेटियां और एक बेटा।
नवल किशोर की शुरूआती पढ़ाई को लेकर भी काफ़ी तरह की विरोधाभासी बातें कही और लिखी गई हैं लेकिन एक बात अंतिम रूप से निर्विवाद रूप से स्थापित है कि उनकी बचपन की शिक्षा-दीक्षा के नतीजे में ही वे हिंदी-उर्दू-फ़ारसी जैसी भाषाओं के उस्ताद बन सके थे। आगे की पढ़ाई, ख़ासकर अंग्रेज़ी की पढ़ाई, के लिए उन्हें सासनी से आगरा भेज दिया गया। छात्र जीवन से ही मुंशी नवल किशोर को लिखने से लगाव हो गया और उन्होंने पढ़ाई के दौरान ही उर्दू अख़बारों में लिखना शुरू कर दिया था। 1854 में इसी आधार पर उन्हें लाहौर के मशहूर अख़बार 'कोहिनूर' में नौकरी मिल गई थी।
'कोहिनूर' के संपादक-प्रकाशक मुंशी हरसुख राय के साथ काम करते हुए ही नवल किशोर पंडित नवल किशोर से मुंशी नवल किशोर हुए। इसी जगह रहकर उन्होने अख़बार और छापेख़ाने के कारोबार को सीखा और समझा। मुंशी नवल किशोर ने कोई दो साल तक अपनी पूरी कारोबारी काबिलियत और मुंशियाना क्षमता के दम पर कोहिनूर प्रेस में अपने लिए एक अलग स्थान बना लिया था। मुंशी हरसुख राय ने काम से प्रभावित होकर उनको प्रेस और अख़बार का काम संभालने के भरपूर मौके दिए और मुंशी नवल किशोर ने इन मौकों को से अपनी क्षमता को और भी निखारा।
मुंशी नवल किशोर 1856 में लाहौर से आगरा लौट गए। आगरा में उन्होंने एक साप्ताहिक अख़बार 'सफीर-ए-आगरा' शुरू कर दिया। इसका पहला अंक 19 जनवरी 1856 को जारी हुआ लेकिन यह अखबार बहुत दिन तक ज़िंदा नहीं रह सका। अगला ही साल यानी 1857 हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ बग़ावत और पूरे मुल्क में ज़बरदस्त उथल पुथल से भरा था। ऐसे में किसी छोटे अख़बार का ज़िंदा रहना संभव नहीं था।
मुंशी नवल किशोर आगरा से लखनऊ पहुंचे जहां उन्होंने अपनी सबसे बड़ी कामयाबी के रूप में 'मतबा नवल किशोर' अर्थात 'नवल किशोर प्रेस' की स्थापना की। साक्ष्यों के अनुसार यह प्रेस 23 नवम्बर 1858 को स्थापित हुआ। इसके बाद से इस प्रेस ने उर्दू और हिंदी और फ़ारसी भाषा और साहित्य की जो सेवा की है वह सारी दुनिया के सामने है।
वुज़ू पर ज़ोर देते थे मुंशी नवल किशोर
मुंशी नवल किशोर ख़ुद फ़ारसी-उर्दू के साथ ही साथ अंग्रेज़ी के भी अच्छे विद्वान थे लेकिन दूसरी ज़बानों के मुकाबले उनका उर्दू और फारसी से लगाव पूर्णतः स्पष्ट है।
ईरान के एक प्रोफेसर मोहम्मद तवक्कुली जो अमरीका की इलिनियोज़ यूनीवर्सिटी में इतिहास के प्रोफेसर हैं, 1992 में नवल किशोर प्रेस के इतिहास की पड़ताल करने के उद्देश्य से लखनऊ पहुंचे . उनके शोध का विषय था:- '' India’s contribution to the formation of Iranian Modernity. '' अपने इस गहन शोध के दौरान उन्होने मुंशी जी के परिवार के सदस्यों की मदद से हर मुमकिन बात को जानने की कोशिश की है। इस पड़ताल में कुछ दिलचस्प चीज़ें मुंशी जी की शख़ि्सयत और उनके प्रेस के बारे में मालूम होती हैं। एक तो यह कि नवल किशोर प्रेस से फारसी, उर्दू, अरबी, संस्कृत, हिंदी, मराठी, बंगाली, पंजाबी, पश्तो ज़बानों में कोई पांच हज़ार किताबें छपी हैं। और यह सच्चाई भी सामने आती है कि 19वीं शताब्दी में नवल किशोर प्रेस से फारसी किताबों की तादाद फ़ारसी ज़बान वाले मुल्क ईरान में छपी फ़ारसी किताबों से भी ज़्यादा थी। इन किताबों में फ़िरदौसी का 'शाहनामा', 'दीवान-ए-हाफ़िज़', 'दीवान-ए-अमीर ख़ुसरो', 'दीवान-ए-उर्फी', और कुल्लियात की कड़ी में जामी, सादी, अनवरी, ज़ाहिर फ़ारयाबी, बेदिल और ग़ालिब जैसे महान नाम शामिल हैं।
तवक्कुली की मुलाक़ात पुरानी दिल्ली के एक जिल्दसाज़ से हुई जिसने अपने पूर्वजों के हवाले से मुंशी नवल किशोर के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। कि नवल किशोर 'क़ुरान' की जिल्दसाज़ी करने वाले अपने तमाम दफ्तरियों से काम शुरू करने से पहले वुज़ू करवाते थे।
मुंशी जी के इस स्वभाव ने सारे मुल्क बल्कि दुनिया के मुस्लिम मुल्कों की नज़र में उन्हें एक ऐसे दरवेश का दर्जा दिला दिया जिसके दरबार में राजा और रंक बराबरी से हाज़िरी देकर गौरवान्वित महसूस करते थे। 1885 में अफगानिस्तान के शाह अब्दुर्रहमान का लुधियाना दरबार में आना हुआ। वे मुंशी नवल किशोर से मिलने की हसरत लिए हुए आए थे। वे उन्हें 'इल्म का बादशाह' मानते थे। मुंशी जी से मुलाक़ात हुई तो उन्होने कहा कि ''खुदा का शुक्र है कि आपसे मुलाकात हो गई। हिंदुस्तान में जो खुशी आपसे मिल कर हुई वो किसी काम से नहीं हुई।''
ईसाई पादरी ने मुंशी जी को कट्टर मुसलमान घोषित कर दिया
हक़ीक़त यह है कि मुंशी जी से बाहर के मुल्कों से जाकर मिलने वालों की लंबी सूचि है। मुंशी जी के इसी तरह के व्यवहार की वजह से 1884 में अमरीका से भारत गए एक ईसाई धर्म प्रचारक बिशप जान फ्लेचर हस्र्ट धोखा खा गए। ईसाई मज़हब को हिंदुस्तान में फैलाने की गरज़ से आए हुए इस पादरी ने मुंशी जी के उर्दू-फ़ारसी प्रेम और इस्लामी धार्मिक पुस्तकों के प्रचार की लगन को देखकर मान लिया कि मुंशी जी 'कट्टर मुसलमान' हैं। साथ ही उन्हें ईसाई धर्म के प्रसार-प्रचार में उसे बड़ा रोड़ा घोषित कर दिया।
मिर्ज़ा ग़ालिब से गहरी दोस्ती
मिर्ज़ा ग़ालिब से मुंशी जी के बेहद करीबी और मोहब्बत के रिश्ते थे। 3 दिसम्बर 1863 को मिर्ज़ा अल्लाउद्दीन 'अलाई' को लिखे एक ख़त में ग़ालिब ने मुंशी नवल किशोर से अपनी पहली मुलाक़ात का उल्लेख करते हुए उनके व्यक्तित्व को शायराना अंदाज़ में बयान किया है। मिर्ज़ा ग़ालिब और मुंशी नवल किशोर के बीच उम्र का एक लम्बा फासला था। मुंशी जी पूरे 38 बरस छोटे थे। एक दिल्ली में तो दूसरा लखनऊ में। इन दो शहरों के बीच की दूरी 300 मील से अधिक। इन तमाम दूरियों को लांघकर यह दो लोग इक बार मिले तो सारे फासले ख़त्म से हो गए।
नवल किशोर प्रेस से छपी हुई किताबों के एक-एक पन्ने पर मुंशी जी मुहब्बत और ईमानदारी की ऐसी छाप होती थी कि उस दौर का हर छोटा-बड़ा लेखक नवल किशोर प्रेस से अपनी किताब छपवाने की तमन्ना रखता था।
मुंशी नवल किशोर भी ग़ालिब से मिलकर इस कदर ख़ुश थे कि अपनी इस ख़ुशी के इज़हार को मुलाक़ात के ब्योरे की शक्ल में अख़बार में छापने से ख़ुद को रोक न पाए। इस मज़मून से जहां मुंशी जी के दिल में मिर्ज़ा ग़ालिब के लिए विशेष स्थान और सम्मान साफ़ नज़र आता है।
मुंशी नवल किशोर बड़ी ख़ूबियों के मालिक थे। 19 फरवरी 1895 को जब उनकी मौत हुई तब उनकी उम्र 59 बरस की थी। और अगर उनके स्कूल-कालेज के ज़माने से बाहरी दुनिया में उनके काम के वर्षों को गिना जाए तो यह लगभग चालीस साल होते हैं। इन चालीस सालों में उन्होने अख़बार और प्रेस चलाने के अलावा कई समाजी आंदोलनों में अहम हिस्सेदारी की। साथ ही ग़रीबों की खुले हाथ से मदद, स्कूल और कालेजों को माली सहायता पहुंचाना, शहर के और देश के राजनैतिक हालात में ज़रूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करना और इन सबके साथ अपने बड़े से ख़ानदान को साथ जोड़े रखना भी उनके काम के दायरे में शामिल थे।
साभार पहल मैगज़ीन