रॉ के वह एजेन्ट जिन्हें पाकिस्तान में हीरो समझ लिया गया
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3 मार्च 2016 को भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सेना ब्लोचिस्तान प्रांत में गिरफ़्तार कर लिया था।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Apr १९, २०१७ ११:५१ Asia/Kolkata
  • रॉ के वह एजेन्ट जिन्हें पाकिस्तान में हीरो समझ लिया गया

3 मार्च 2016 को भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को पाकिस्तानी सेना ब्लोचिस्तान प्रांत में गिरफ़्तार कर लिया था।

30 मार्च को पाकिस्तानी सेना के जनसंपर्क विभाग ने एक वीडियो जारी की जिसमें कुलभूषण जाधव ने स्वीकार किया कि वह ब्लोचिस्तान और कराची में हिंसक कार्यवाहियां और आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त रहा है। वीडियो में दिखाया गया कि कुलभूषण जाधव भारतीय नौसेना के अधिकारी हैं और उन्होंने भारत की ख़ुफ़िया एजेन्सी रॉ के लिए काम आरंभ किया है।

जारी वर्ष 10 अप्रैल को पाकिस्तानी सेना की कोर्ट मार्शल ने जाधव को जासूसी और आतंकवाद फैलाने के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई। यद्यपि यह मामला बहुत अधिक गरमाया हुआ है किन्तु वास्तव में पाकिस्तान के अनुसार पिछले 46 वर्षों में जाधव 14वां भारतीय जासूस है जिसे पाकिस्तान की ओर से गिरफ़्तार किए जाने के बाद सज़ाए मौत सुनाई गयी है। इससे पहले सबसे गंभीर जासूसी केस दो भाईयों का था जिन्हें पाकिस्तान के कुछ लोगों ने हीरो मान लिया था।

जनवरी 1971 में कश्मीर के दो युवाओं ने श्रीनगर से भारतीय एयर लाइंस का एक विमान हाईजैक कर लिया और पायलट को जहाज़ लाहौर हवाई अड्डे पर उतारने का आदेश दिया। विमान अपचालक हाशिम क़ुरैशी और उसका रिश्तेदार अशरफ़ क़ुरैशी थे। दोनों ने दावा किया कि उनका संबंध जम्मू कश्मीर लेब्रेशन फ़्रंट से है।

जहाज़ को लाहौर हवाई अड्डे पर उतरने दिया गया। इसकी ख़बर जैसे ही पाकिस्तान में फैली एक बड़े हल्क़े ने इन दोनों को हीरो मान लिया। इसका एक कारण यह था कि उस समय के विपक्षीय नेता ज़ुल्फ़ेक़ार अली भुट्टो के हवाई जहाज़ ने भी उसी दिन लाहौर हवाई अड्डे पर लैंड किया था।

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार ख़ालिद हसन ने अप्रैल 2003 में दा फ़्राइ डे टाइम्ज़ में लिखा कि लाहौर हवाई अड्डे के केन्द्रीय द्वार पर जोशीली भीड़ ने भुट्टो का स्वागत किया और उनके समर्थकों ने उन्हें अपचालकों से मुलाक़ात करने और उनके कार्य की प्रशंसा करने पर बल दिया।

भुट्टो के साथ यात्रा पर गये ख़ालिद हसन का कहना है कि उनके कुछ समर्थकों ने अपने कंधों पर बिठाकर उन्हें अपचालकों के पास ले गये, भुट्टो ने अपचालकों से हाथ मिलाया, कुछ अच्छी बातें कीं किन्तु वहां से तुरंत चले गये। उस समय पाकिस्तान में जनरल यहिया ख़ान की मार्शल लॉ सरकार थी। देश का पूर्वी भाग, पूर्वी पाकिस्तानी, गृहयुद्ध के दहाने पर था। हसन ने लिखा कि भुट्टो को अपचालन के इस मामले पर सरकारी दृष्टिकोण पता नहीं था। उन्होंने शिकायत भी की कि उन्हें उनके कुछ जोशीले समर्थकों ने अपचालकों से मुलाक़ात पर विवश किया।

 

वार्ता के बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने अपचालकतं को यात्रियों की रिहाई के लिए मना लिया जिन्हें दिल्ली जाने वाले विमान में सवार कर दिया गया। उसके बाद अपचालित विमान को धमाके से उड़ा दिया गया। समाचार पत्रों के अनुसार अपचालकों ने ख़ाली विमान में डाइनामाइट लगाए थे। अपने एक दूसरे लेख में हसन पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेन्सी के एक अधिकारी आफ़ताब अहमद का बयान नक़ल करते हैं कि उन्होंने ही जहाज़ को आग लगाने का आदेश दिया था। यह काम अपचालकों के हाथों करवाया गया जिन्हें मिट्टी का तेल दिया गया था। पाकिस्तान में हवाई जहाज़ के अपचालन के बाद से ही पाकिस्तान के कुछ हल्क़ों में इन दो क़ुरैशी भाईयों को अलगाववादी समझा जा रहा था, वहां यहिया सरकार ने बड़ी हद तक चुप्पी साध रखी थी। दोनों अपचालकों को गिरफ़्तार कर लिया गया और जम्मू कश्मीर लेब्रेशन फ़्रंट के पाकिस्तान में मौजूद एक महत्वपूर्ण नेता से मुलाक़ात करवाई गयी।

 

ए एच तालिब ने 2014 में ग्रेटर कश्मीर नामक वेबसाइट में इस अपचालन के मामले का विस्तृत ब्योरा लिखा। तालिब ने लिखा कि इन दो अपचालकों को न केवल जेल में डाला गया बल्कि जम्मू कश्मीर लेब्रेशन फ़्रंट के नेता को भी गिरफ़्तार किया गया। इससे पता चलता है कि यहिया सरकार अपचालकों के उद्देश्यों के बारे में संदेह का शिकार थी।

दिसंबर 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में गृहयुद्ध के आरंभ और फिर भुट्टो के सत्ता में आने के साथ ही अपचालन के समाचार, समाचार पत्र से ग़ायब हो गये किन्तु फिर भी भारत में इस मामले को स्पष्ट रूप से कश्मीर में पाकिस्तान के सीधे हस्तक्षेप के प्रमाण के रूप में बयान किया जाता रहा।

तालिब लिखते हैं कि जम्मू कश्मर लेब्रेशन फ़्रंट के नेता और अशरफ़ क़ुरैशी नामक अपचालक को भुट्टो सरकार ने रिहा कर दिया जबकि दूसरे अपचालक हाशमि क़ुरैशी को नौ साल बात 1980 में जनरल ज़ियाउल हक़ की सरकार के दौरान रिहा किया गया। हाशिम हालैंड चले गये किन्त अशरफ़ पाकिस्तान में ही रुके रहे। पंजाब विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन के बाद अध्यापक बन गये और वर्ष 2012 में उनका देहान्त हो गया।

14 फ़रवरी 2001 में दिए गये एक इन्टरव्यू में हाशिम अंसारी ( जो 2001 में हालैं से भारत लौट आए थे) ने बताया कि उनके (1973 में) मुक़द्दमे के दौरान पाकिस्तानी सरकार ने अशरफ़ और उन पर रॉ के लिए काम करने का आरोप लगाया। इसी इन्टरव्यू में हाशिम ने आरोप लगाया कि अशरफ़ और उन्हें पाकिस्तानी एजेन्सियों ने जहाज़ अपचालन के काम में फंसाया था किन्तु हाशिम यदि भारत न लौटते तो उनका दृष्टिकोण शायद कुछ और ही होता, जहाज़ अपचालन में पाकिस्तान का हाथ है, हाशिम के इस दावे के 13 साल बात रॉ के एक पूर्व वरिष्ठ जासूस आर के यादव ने 2014 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “मिशन रॉ” में लिखा कि रॉ ने हाशिम क़ुरैशी को अपने लिए काम करने पर तैयार किया, योजना को अंतिम रूप देने के बाद हाशिम को एक दूसरे जासूस अशरफ़ क़ुरैशी के साथ इंडियन एयर लाइंस के एक विमान का अपचालन करके लाहौर ले जाने दिया गया।

रॉ ने ही हाशिम को विमान के अंदर एक ग्रेनेड और एक खिलौना पिस्तौल ले जाने में सहायता की। लाहौर हवाई अड्डे पर मौजूद पाकिस्तानी अधिकारियों को जब यह बताया कि विमान का कश्मीरी अलगाववादियों ने अपचालन किया है तो उन्होंने विमान को लाहौर में उतरने की अनुमति दे दी। आल इंडिया रेडियो ने शीघ्र ही इस मामले पर समाचार प्रसारित कर दिया, इस मामले ने भारत को बड़ी सरलता से पाकिस्तान की उड़ानों को रद्द करने का अवसर प्रशस्त कर दिया जिसने यहिया ख़ान के पूर्वी पाकिस्तान में हवाई जहाज़ द्वारा सैनिक भेजने की योजना में रुकावट डाल दी। ख़ालिद हसन लिखते हैं कि अपचालक, भारत और पाकिस्तान के मध्य खेले जा रहे एक बड़े गेम का शिकार हुए, एक गेम जिसे यह युवा अपचालक पूरी तरह समझे भी नहीं थे, इसीलिए तो अशरफ़ को पाकिस्तान में रहने दिया गया और हाशिम भारत लौट गये। (AK)