मैं भारत का मुसलमान हूं, संघर्ष करना मेरा काम है,
मैं एक मुसलमान हूं। मैं भारत का नागरिक हूं। मुझे अपने घर से प्यार है। घर वालों से प्यार है। रिश्तेदारों से प्यार है। मुझे अपने गांव से प्यार है। मैं पहली बार जब अपने ज़िले से निकलकर दूसरे ज़िले में पहुंचा तो अपनी बोली से मुझे बहुत प्यार है इस बात का आभास पहली बार हुआ।
जब वहां अलग अलग जनपदों से आए हुए लोगों ने मेरे इलाक़े की बोली का मज़ाक़ उड़ाया तो मुझे बुरा लगा और मैंने अपनी बोली (पूर्वी उत्तर प्रदेश की स्थानीय बोली) का बचाव किया और आलोचक लड़कों की बोली पर हमला कर दिया। इस बहस में कभी कोई पक्ष जीत नहीं पाया। इसके बाद मैं आगे की शिक्षा के लिए अपने राज्य से दूसरे राज्य में चला गया और मुंबई जैसे बड़े शहर में एक हास्टल में अलग अलग राज्यों के छात्रों के साथ रहने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। हास्टल में यूपी के भइयों की लड़ाई लड़नी पड़ी, उनका बचाव करना पड़ा। मुंबई के बाद शिक्षा के लिए ही विदेश जाना हुआ जहां अलग अलग देशों के छात्रों के बीच रहने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। इन छात्रों के बीच भारत का बचाव करना पड़ता था। यह सोच बहुत आम है कि भारत बहुत ग़रीब देश है। इस देश में बहुत से लोग सपरिवार सड़कों के फ़ुटपाथ पर जीवन गुज़ारते हैं। लेकिन फ़िल्में बहुत अच्छी बनती हैं और फ़िल्मों में भी भारत की ग़रीबी साफ़ झलकती है। इसका भी बचाव करना पड़ा अलबत्ता ग़रीबी की जो हालत है उसका सही ढंग से तो बचाव किया नहीं जा सकता लिहाज़ा उल्टे सीधे तर्कों से बचाव किया। इस बीच मुझे यह आभास हुआ कि मुझे अपने देश से प्यार है। उसकी बुराइयां पता हैं लेकिन दूसरों के सामने इन बुराइयों की भी लीपापोती करनी चाहिए यह अपना कर्तव्य महसूस हुआ।
मुझे लगता है कि मैं जिस सफ़र से गुज़रा हूं और मेरे जो एहसासात रहे हैं वह किसी भी सामान्य हिंदुस्तानी के एहसासात होंगे।
मगर अब मुझे डर लग रहा है और किसी सीमा तक मायूसी भी है। डर इस लिए लग रहा है कि आए दिन ख़बरों में पढ़ता हूं और इंटरनेट पर वीडियो क्लिप देखता हूं कि मुसलमानों पर हमले हो रहे हैं। इस संदेह में कि किसी मुसलमान के घर में गाय का गोश्त है उसे उसकी मां के सामने भीड़ पीटती है और उसकी जान ले लेती है। लेकिन हत्यारों के ख़िलाफ़ कार्यवाही तो बहुत दूर की बात है उनकी सही तरह से निंदा तक नहीं की जाती। इस लिए कि उनके तार केन्द्र में सत्ताधारी पार्टी से जुड़े हुए हैं।
मैं वीडियो क्लिप देखता हूं कि गाय तसकरी के संदेह में एक बूढ़े व्यक्ति की इतनी पिटाई की जाती है कि वह मर जाता है। इस घटना की निंद तो सुनाई दी लेकिन साथ ही हत्यारों का बचाव भी बड़े पैमाने पर किया गया। मैं हरियाणा की उस लड़की की बातचीत सुनता हूं जिसके साथ गौरक्षकों ने रेप किया और कहा कि रेप इस लिए कर रहे हैं कि तुम लोग गाय का गोश्त खाते हो।
मैं देखता हूं कि बड़ी संख्या में मुसलमानों को बम धमाकों में लिप्त होने के संदेह में वर्षों बल्कि दशकों तक जेल में बंद रखा जाता है और फिर वह सुबूत के अभाव के कारण बड़ी मुश्किल से छूटते हैं।
इससे पहले मैं देखता हूं कि गुजरात में दंगे होते हैं बड़ी संख्या में लोगों की जानें जाती हैं और महिलाओं से बलात्कार किया जाता है लेकिन दोषियों को सज़ा नहीं मिलती और जिन्हें सज़ा मिली भी उन्हें बचाने के लिए सरकारी तंत्र सौ प्रकार के प्रयास कर रहा है।
मैं पुलिस की ओर से निराश हूं क्योंकि मैं देखता हूं कि पुलिस मुसलमानों को बड़ी आसानी से पकड़कर जेलों में डाल देती है और उनका एनकाउंटर कर देती है।
राजनीति की बात की जाए तो मुझे कभी कांग्रेस पार्टी से बड़ी उम्मीदें थीं फिर धीरे धीरे पता चला कि कांग्रेस में काली भेड़ें बहुत ज़्यादा हैं। मुझे मुलायम सिंह की पार्टी से बड़ी उम्मीद हो गई लेकिन बार बार यह एहसास हुआ कि उम्मीद लगाना ग़लत है। यह पार्टी कुछ मुस्लिम परिवारों का तो भला कर सकती है लेकिन मुस्लिम समुदाय के लिए वह कुछ भी बुनियादी काम करने वाली नहीं है। मुझे कभी कभी मायावती की सरकार अच्छी लगी लेकिन फिर समझ में आ गया कि इस पार्टी से भी आस लगाना ग़लत है क्योंकि समाजवादी पार्टी की तरह बहुजन समाज पार्टी भी बहुत भ्रष्ट पार्टी है। यह मुसलमानों की बात तो बहुत दूर है ग़रीब हिंदुओं के लिए भी कुछ नहीं करने वाली है।
मुझे बड़ी शिद्दत से यह एहसास है कि किसी भी राजनैतिक दल को अपनी क़िस्मत सौंप देना ठीक नहीं है क़िसमत मुझे अपने हाथ में ही रखनी होगी। मुझे मुसलमान होने की हैसियत से अपने आप को इतना मज़बूत बनाना होगा कि मैं किसी भी पार्टी के रहमो करम पर न रहूं बल्कि एक पक्ष के रूप में बात करूं एक मज़बूत पक्ष के रूप में। फिर उस बातचीत में दूसरा पक्ष चाहे भाजपा, कांग्रेस हो, सपा, बसपा या कोई भी हो।
मुझे अपने आप को इतना मज़बूत बनाना होगा कि मैं अपने घर, अपने गांव, अपने राज्य और अपने देश को पराया समझने में मजबूर न होऊं बल्कि अपनी हर आइडेंटिटी का डटकर बचाव करूं, किसी से न डरूं, किसी से न घबराऊं, अपने बच्चों को किसी भी शहर में और भारत के किसी भी स्थान पर भेजने में मुझे संकोच न हो कि उस जगह पर मुसलमान नहीं हैं।
मुझे मज़बूत बनना है। मुझे अपनी राजनैतिक ताक़त भी बढ़ानी है, मुझे अपनी आर्थिक ताक़त भी बढ़ानी है, मुझे अपने शैक्षिक हालत भी सुधारनी है, मुझे हर विभाग में हिस्सेदारी चाहिए। मुझे सिविल सर्विसेज़ में भागीदारी चाहिए, मुझे सेना में भागीदारी चाहिए, मुझे पुलिस में भागीदारी चाहिए, मुझे राजनीति में भागीदारी चाहिए, मुझे शैक्षिक संस्थानों में भागीदारी चाहिए, मुझे मीडिया में भागीदारी चाहिए, मुझे समाज के हर मंच पर भागीदारी चाहिए ताकि मुझे अपने देश का कोई भी मंच पराया न लगे।
मैं मुसलमान हूं, विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आप को निराशा से बचाना चाहिए, अपने अधिकारों के लिए लड़ना चाहिए, यह मुझे सीख मिली है। इस्लाम एेसी ही परिस्थितियों में फला फूला है। मुझे यह सीख मिली है कि बड़े लक्ष्य के लिए संघर्ष करो यह संघर्ष अपने आप में एक इबादत है। नतीजा क्या होगा यह अल्लाह के हाथ में है। रास्ता तय करना मेरा काम है, कभी भी क़दम न रोकना मेरा काम है। मंज़िल तक पहुंच पाता हूं या नहीं यह ईश्वर की मर्ज़ी पर निर्भर है।
(रविश ज़ैदी)
नोटः यह लेखक के निजी विचार हैं, इससे पार्स टुडे हिंदी का सहमत होना ज़रूरी नहीं।