भारत और इस्राईल के संयुक्त दुश्मन कौन?
दुनिया भर में देश अपने संबंधों के कारण पहचाने जाते हैं और उसी के अनुसार वह लोकप्रिय भी होते हैं।
किसी भी शासन के तीन प्रकार के संबंध होते हैं, एक अपनी जनता के साथ, दूसरे अपनी संस्थाओं के साथ और तीसरे बाहरी दुनिया के साथ। सफल शासन अपनी जनता के लिए टार्चर सेल या यातनाघर बनाने के बजाए, उच्च शिक्षण संस्थान बनाते हैं और उनके स्वास्थ्य और रोज़गार जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को सुनिश्चित बनाते हैं। इंसान की जान को बहुत महत्व प्राप्त है और जनता की शिकायत को तुरंत दूर किया जाता है। हमारे यहां दुर्भाग्य से चलती गाड़ियों में आग भड़क उठती है और यात्री झुलस कर राख हो जाते हैं चूंकि हमारे यहां ऐसी गाड़ियां चल रही हैं जिनमें केवल एक ही दरवाज़ा होता है और उससे सवार होना या उतरना बहुत मुश्किल काम है। अभी तक हमारी किसी संस्था ने इस पर ध्यान नहीं दिया कि जान बचाने के लिए कम से कम गाड़ियों के दरवाज़े पर ही ध्यान दिया जाए।
दूसरी ओर प्रशासन के संबंध अपनी संस्थाओं के साथ इतने खेदजनक हैं कि राज्य प्रशासन एक दूसरे से सुरक्षा के मामले में भी सहयोग नहीं करते, संस्थाओं का आपसी सहयोग निश्चित हो जाए तो देश में आतंकवाद, सांप्रदायिकता और दंगे फ़साद पर नियंत्रण पाना कोई कठिन काम नहीं। तीसरा मामला प्रशासन का दूसरे देशों के साथ संबंध है। इस संदर्भ में भी हालत बहुत ख़राब है। हम अपने दोस्तों और दुश्मनों का निर्धारण नीतियों और राष्ट्रीय हितों के बजाए डॉलरों के कारण करते हैं।
हमने अपने पड़ोसियों को दुश्मन और दूसरों के लुभावे में आकर उनको अपना दोस्त समझ लिया है। यदि दुनिया भर के मुसलमान इस्राईल को अपना दुश्मन समझते हैं तो इस्राईल के साथ सऊदी अरब के बढ़ते संबंध और भारतीय प्रधानमंत्री का इस्राईल दौरा हमारी नीदें उड़ाने के लिए काफ़ी है। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इस्राईल दौरा था।
इस्राईल के दौरे के दौरान इस्राईली प्रधानमंत्री ने प्रोटोकोल तोड़ते हुए स्वयं मोदी का बेन गोरियन हवाई अड्डे पर स्वागत किया, अमरीकी राष्ट्रपति और पोप फ़्रांसिस के बाद मोदी तीसरे व्यक्ति बने जिनका इस प्रकार का स्वागत किया गया। शीतयुद्ध के काल तक भारत ने इस्राईल से संबंध नहीं बनाए थे क्योंकि उस समय फ़िलिस्तीनियों का समर्थन प्रबल रूप से किया जाता था लेकिन उसके बाद भारत ने इस्राईल से कूटनैतिक संबंध स्थापित कर लिए।
इस्राईल ऐसा शासन है जिसने फ़िलिस्तीन की धरती पर 1948 में क़ब्ज़ा करके अपने अस्तित्व की घोषणा की और वर्ष 1976 में उसने लगभग 78 प्रतिशत फ़िलिस्तीनी भूमियों और साथ ही पड़ोसी देशों के कुछ क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया। मोदी का इस्राईल दौरा इस्लामी जगत के ध्यान का केन्द्र बना और इस दौरे का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें पहली बार सऊदी अरब की भांति भारत ने अपनी विदेश नीति में परिवर्तन करते हुए फ़िलिस्तीन की अनदेखी कर दी।
इससे पहले अक्तूबर 2015 में जब भारत के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इस्राईल का दौरा किया था तो वह रीति के अनुसार पहले फ़िलिस्तीन गये और उसके बाद इस्राईल पहुंचे किन्तु मोदी जी ने सारी रीति रिवाजों को एक ओर रखकर केवल इस्राईल का दौरा करके सिद्ध कर दिया कि भारत, फ़िलिस्तीन के बजाए इस्राईल को अधिक महत्व देता है।
टीकाकारों का कहना है कि सऊदी अरब और भारत के निकट संबंध के कारण इस बार नरेंद्र मोदी के इस दौरे में फ़िलिस्तीन शामिल नहीं है। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार इस्राईल के विदेशमंत्रालय के डिप्टी डायरेक्टर जनरल मार्क सोफ़र ने नरेंद्र मोदी के दौरे के अवसर पर कहा कि भारत को हक़ हासिल है कि वह आतंकवाद से स्वयं को सुरक्षित रखे। उनका कहना था कि भारत और इस्राईल एक ही प्रकार के दुश्मन से परेशान हैं और उनका दुश्मन संयुक्त है। अब प्रश्न यह है कि भारत और इस्राईल के संयुक्त दुश्मन कौन हैं?
“लेखक के विचारों से पार्स टूडे का सहमत होना आवश्य नहीं है”