गुजरात राज्य सभा चुनाव, ऐसा मुक़ाबला जो कभी नहीं देखा
गुजरात का राज्य सभा चुनाव जो आम तौर पर रूटीन की प्रक्रिया है, साख का मुद्दा बन गया। भाजपा ने एक धारणा पैदा कर दी है कि वह बहुत बड़ा मुक़ाबला हार गई है।
भाजपा वह दोनों सीटें जीत गई जिनकी उसे अपेक्षा थी, हां तीसरी सीट जिसे वह जीतने के लिए जी जान से जुटी हुई थी उसे वह हार गई। भाजपा ने विपक्षी कांग्रेस पार्टी के विधायकों से क्रास वोटिंग करके तीसरी सीट जीतने का प्लान बनाया। आख़िरकार कांग्रेस के उम्मीदवार अहमद पटेल पहले ही राउंड में सीट जीत गए। उन्हें आवश्यक 44 वोट मिल गए जबकि दो कांग्रेसी विधायकों के वोट रद्द कर दिए गए। चुनाव आयोग ने कांग्रेस और भाजपा दोनों की ओर से बनाए गए भारी दबाव के बीच संवैधानिक मज़बूती दिखाई और स्वाधीनता का परिचय दिया।
यह मुक़ाबला एक पाठ है कि राज्य सभा का चुनाव इस तरह नहीं लड़ा जाना चाहिए था। क्रास वोटिंग को प्रोत्साहन देना इस वैधानिक प्रक्रिया का ग़लत इसतेमाल है। जब विधान सभा में सीटों की संख्या के आधार पर पहले से ही तय है कि किस पार्टी के कितने कैन्डीडेट जीतेंगे तो उससे अधिक उम्मीदवारो को मैदान में उतारने का कोई तुक नहीं है।
कांग्रेस ने अपने विधायकों को सौदेबाज़ी से बचाने के लिए बैंगलूरू के एक रिसार्ट में पहुचां दिया जहां वह सत्ता में है। उधर इनकम टैक्स विभाग ने कर्नाटक के मंत्री के घर पर छापा मार दिया। इस सबसे यह संदेश गया कि भाजपा कांग्रेस को इस एक सीट से वंचित करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। चूंकि अहमद पटेल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के क़रीबी हैं अतः दोनों पार्टियों के बीच प्राक्सी वार और भी तेज़ हो गई थी। नतीजा यह है कि कांग्रेस को इस समय एक सहारा मिला है। भाजपा को यह याद रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक संस्कारों की दांव पर लगाकर राजनैतिक वर्चस्व की लड़ाई लड़ना अधिकतर नुक़सान का सौदा होता है।
साभार द हिंदू