हैदराबाद धमाका केस का फ़ैसला, धीमा अन्याय
https://parstoday.ir/hi/news/india-i47244-हैदराबाद_धमाका_केस_का_फ़ैसला_धीमा_अन्याय
हैदराबाद में वर्ष 2005 में हुए धमाके में पुलिस टास्क फ़ोर्स के हाथों गिरफ़तार किए गए सभी दस आरोपियों का थोक में एक साथ बेगुनाह साबित होकर रिहा हो जाना अपराध और न्याय के बीच पायी जाने वाली खाई पर गहरे चिंतन की तक़ाज़ा करता है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Aug १२, २०१७ १०:५९ Asia/Kolkata
  • हैदराबाद धमाका केस का फ़ैसला, धीमा अन्याय

हैदराबाद में वर्ष 2005 में हुए धमाके में पुलिस टास्क फ़ोर्स के हाथों गिरफ़तार किए गए सभी दस आरोपियों का थोक में एक साथ बेगुनाह साबित होकर रिहा हो जाना अपराध और न्याय के बीच पायी जाने वाली खाई पर गहरे चिंतन की तक़ाज़ा करता है।

जहां इस प्रकार के मामलों में रिहाई से राहत मिलती है वहीं अन्याय की भावना भी पैदा हो जाती है। वैसे यह उन लोगों को भी अन्याय लगता है जो यह महसूस करते हैं कि आरोपी छूट जाने में सफल हो गए लेकिन अधिकतर उन लोगों के बीच जिन्होंने अपनी जवानी के शुरुआती साल जेल में गुज़ार दिए उनके बीच इस नुक़सान से अन्याय की भावना पनपती है। हालिया समय में एसी कई घटनाएं सामने आई हैं कि आतंकवाद में लिप्त होने के आरोप में गिरफ़तार किए गए लोग बेगुनाह साबित होकर आज़ाद हुए। निसारुद्दीन अहमद का एक उदाहरण है जिन्होंने श्रंखलाबद्ध ट्रेन धमाकों के मामले में 23 साल जेल में गुज़ारे बाद में उन्होंने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने बेगुनाह मानकर रिहा कर दिया।

अली गढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी के रिसर्च स्कालर गुलज़ार मुहम्मद वानी को हिज़्बुल मुजाहेदीन का सदस्य होने के आरोप में 16 साल तक जेल में रखा गया लेकिन सुबूत न होने के कारण उन्हें भी रिहा किया गया। इस प्रकार की घटनाओं से जांच तंत्र और न्याय तंत्र की गंभीर कमज़ोरियां सामने आती हैं।

आतंकवाद से जुड़े मामलों में अदालतें ज़मानत देने से इंकार कर देना चाहती हैं लेंकिन दूसरी ओर तत्काल न्यायिकय प्रक्रिया की प्रतिबद्धता भी पूरी नहीं हो पाती। लंबी न्यायिक प्रक्रिया अभियोजन पक्ष के केस को भी कमज़ोर कर देती है। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि जो भी रिहा कर दिया गया कि निश्चित रूप से बेगुनाह ही था।

बहरहाल इस समस्या से निपटने के लिए यह ज़रूरी है कि आतंकवाद जैसे संगीन मामलों में ट्रायल प्रक्रिया तेज़ी से पूरी होनी चाहिए और निर्धारित समय सीमा के भीतर इसे पूरा कर लिया जाना चाहिए। न्याय को यदि अर्थपूर्ण बनाना है कि यह स्लो मोशन में नहीं होना चाहिए।

साभार दि हिंदू