उपेक्षा का ख़मियाज़ा: गोरखपुर में हुई मौतों के बारे में
उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख अस्पताल में कुछ दिनों के भीतर 60 से ज्यादा बच्चों की मौत ने देश के विवेक को हिला कर रखा दिया। यह एसी त्रासदी है जिसे निश्चित रूप से रोका जा सकता था।
7 अगस्त और 11 अगस्त के बीच गोरखपुर में बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की मौतें क्यों हुईं इसका पता लगाने के लिए स्वतंत्र जांच की जाएगी। यह जांच होना ज़रूरी है कि उन लोगों को ऑक्सीजन की आपूर्ति में बाधा से कितना नुकसान हुआ है, जो गंभीर रूप से बीमार थे। मौतों और आक्सीजन की सप्लाई में रुकावट के बीच संबंध की इस बात से अप्रत्यक्ष रूप से पुष्टि हो जाती है कि राज्य सरकार ने कॉलेज के प्रिंसिपल को निलंबित कर दिया था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आनन फ़ानन में किया गया दावा कि ऑक्सीजन की कमी के कारण कोई मौत नहीं हुई थी किसी भी प्रशासनिक जांच को प्रभावित करेगा। ऑक्सीजन की आपूर्ति करने वाली कंपनी ने अदा न किए गए कई बड़े बिलों पर अस्पताल को नोटिस जारी किया था और संकट की चेतावनी दी थी। इस मामले में केवल एक उच्चस्तरीय न्यायिक जांच की ही विश्वसनीयता होगी। लगभग दो दशकों तक गोरखपुर का प्रतिनिधित्व करने वाले एक सांसद के रूप में, श्री आदित्यनाथ महामारी से बहुत परिचित थे, जिसने अपने निर्वाचन क्षेत्र को अक्सर बार-बार बिगाड़ दिया था। पिछली राज्य सरकारों ने इस समस्या का समाधान करने के लिए कुछ ख़ास नहीं किया, लेकिन इस त्रासदी के प्रति आदित्यनाथ का यह रवैया नहीं हो सकता।
घातक रोगों की घटनाओं को कम करने के लिए मजबूत मेडिकल बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है, जिसे सरकारें तभी जल्दी बना सकती हैं जब इसके लिए इच्छ शक्ति हो। केंद्र सरकार ने प्राथमिकता वाले जिलों में बाल चिकित्सा केन्द्रों की स्थापना के और टीकाकरण कार्यक्रम के लिए एक प्रतिबद्धता जताई है, लेकिन इसका कोई ख़ास असर नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारों के लिए यह एक उचित अवसर है कि वे अपने खराब रिकॉर्ड पर विचार करें।
साभार दि हिंदू