क्या भारत, अमरीकी दबाव में ईरान से अपना नाता तोड़ लेगा..?
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भारत और ईरान के बीच प्राचीन व्यापारिक संबंध रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव में यह संबंध प्रभावित अवश्य हुए हैं किन्तु कभी दोनों देशों के रिश्तों में कड़ुवाहट नहीं आई क्योंकि दोनों देश अच्छी तरह जानते हैं कि उनके बेहतर संबंध उनके देश के विकास और जनता की ख़ुशहाली की गैरेंटी हैं।
(last modified 2023-11-29T05:45:15+00:00 )
Jun ३०, २०१८ ११:३७ Asia/Kolkata
  • क्या भारत, अमरीकी दबाव में ईरान से अपना नाता तोड़ लेगा..?

भारत और ईरान के बीच प्राचीन व्यापारिक संबंध रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के प्रभाव में यह संबंध प्रभावित अवश्य हुए हैं किन्तु कभी दोनों देशों के रिश्तों में कड़ुवाहट नहीं आई क्योंकि दोनों देश अच्छी तरह जानते हैं कि उनके बेहतर संबंध उनके देश के विकास और जनता की ख़ुशहाली की गैरेंटी हैं।

भारत में उस समय भी ईरानी व्यापारी व्यापार के लिए आते रहे जब संसाधनों की कमी थी। अपनी सभ्यता और संस्कृति के रक्षक बनकर इस धरती पर पैर रखे और भारत की सभ्यता और संस्कृति पर गहरे प्रभाव डाले। ईरानी व्यापारियों के अतिरिक्त दूसरे विभागों और क्षेत्रों से संबंधित लोगों ने भी भारत को अपना केन्द्र बनाया।

आज भी उनके कारनामे इतिहास में सुरक्षित हैं और ऐतिहासिक धरोहरें हमारी नज़रों के सामने हैं। मगर इन दोनों प्राचीन मित्रों के रिश्तों को प्रभावित करने और व्यापारिक संबंधों को समाप्त करने की साज़िशें भी हमेशा होती रही है। यह साज़िश कभी पूरी तरह सफल तो नहीं हो सकीं क्योंकि दोनों पक्ष विरोधियों की राजनीति और अपनी मित्रता के महत्व को भलि भांति समझते हैं।

यह संबंध अंतर्राष्ट्रीय दबावों और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों के बाद किसी सीमा तक प्रभावित अवश्य हुए किन्तु कभी ख़त्म होने की नौबत नहीं आ सकी। आज भी विश्व साम्राज्य की यही इच्छा है कि किसी ही प्रकार ईरान और भारत के बीच नफ़रत की दीवार खड़ी कर दी जाए ताकि वह अपना राजनैतिक हित प्राप्त करने में सफल हो सके।

हाल ही में ईरान पर ताज़ा अमरीकी प्रतिबंधों के बाद अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में तेज़ी से परिवर्तन सामने आए जबकि यूरोपीय संघ और रूस तथा चीन जैसे दूसरे महत्वपूर्ण देशों ने अमरीकी प्रतिबंधों को स्वीकार नहीं किया बल्कि अमरीका इस प्रयास में है कि किसी भी प्रकार ईरान को आर्थिक मंच पर अकेला कर दिया जाए।

चीन, भारत और दूसरे देश अमरीका की राजनैतिक चालों को समझ रहे हैं इसीलिए अभी तक उनका रवैया ईरान के बारे में संतोषजनक है क्योंकि यदि यह देश ईरान से व्यापारिक संबंध समाप्त कर लेत हैं तो उनके देश का आर्थिक ढांचा बहुत कमज़ोर हो जाएगा जिसका सीधा प्रभाव देश की जनता पर पड़ेगा। इस समय भारतीय रुपये की क़ीमत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में रिकार्ड गिरावट पर है, अब यदि भारत, अमरीकी फ़ैसले को स्वीकार कर लेता है तो इस फ़ैसले का प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था की कर तोड़कर रख देगा। यूं भी भारत ने ईरान के साथ अच्छे संबंधों के लिए बहुत अधिक पूंजीनिवेश किया हुआ है, चाहबहार बंदरगाह का समझौता पूरा हो चुका है, दूसरी महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम जारी है। यदि भारत अमरीकी दबाव में आकर ईरान से व्यापारिक संबंध तोड़ लेता है तो उसके अरबों रुपये के निवेश पर पानी फिर जाएगा।

अमरीका ने ईरान से कच्चा तेल हासिल करने के लिए समस्त देशों को धमकी भरे लहजे में कहा है कि वह 4 नवम्बर 2018 तक ईरान से पूरी तरह तेल आयात बंद कर दें वरना ईरान के साथ उन्हें भी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा। विदित रूप से यह धमकी उन देशों को अवश्य भयभीत कर सकती है जिनकी शक्ति अमरीका के मुक़ाबले में बहुत कम है और उनके राष्ट्राध्यक्षक अमरीकी सहायता पर गुज़र बसर कर रहे हैं, या उनके देश की आंतरिक नीति में अमरीका का हस्तक्षेप होता है किन्तु भारत और चीन जैसे देश जो अमरीका पर पूरी तरह निर्भर नहीं हैं, उसकी गीदड़ भभकियों से डरने वाले नहीं हैं।

चीन तो यूं भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अमरीका का ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धी है और अमरीका भी चीन के उद्योग और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार पर उसकी पकड़ से भयभीत है। चीन भी भलिभांति जनता है कि अमरीका किसी सीमा तक उसके मार्ग में रोड़ा बन सकता है इसीलिए वह अमरीकी धमकियों से भयभीत अपनी व्यापारिक गतिविधियों में व्यस्त है।

रही भारत की बात तो विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने स्पष्ट रूप से पहले ही यह कह दिया था कि भारत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों को स्वीकार करने के लिए तैयार है किन्तु वह किसी एक विशेष देश के फ़ैसले को मानने पर प्रतिबद्ध नहीं है। सुषमा स्वराज के इस बयान से भारत सरकार के दृष्टिकोण का पता अवश्य चलता है किन्तु अभी तक भारत की समझ में नहीं है कि वह अमरीकी धमकियों का जवाब किस लहजे में दे।

अमरीकी धमकी के बाद विदेशमंत्रालय के प्रवक्ता रविश कुमार ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि अमरीका के बयान में ईरान से 4 नवम्बर तक तेल का आयात बंद करने की बात कही गयी है। संबंध समाप्त करने की नहीं। यह बयान किसी विशेष देश की परिधि में नहीं है। हम सब पक्षों के साथ मिलकर देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को बाक़ी रखने के लिए समस्त कार्यवाही करेंगे। रविश कुमार ने कहा कि ईरान और भारत के संबंध, ऐतिहासिक हैं और हम अमरीका के दृष्टिकोण से अलग अपना दृष्टिकोण रखते हैं जिसका स्पष्टीकरण पहले किया जा चुका है।

 विदेशमंत्रालय का बयान स्पष्ट करता है कि भारत, अमरीकी दबाव में ईरान से तेल आयात कर सकता है किन्तु वह संबंध समाप्त करने पर तैयार नहीं है, हम भारत की इस कार्यवाही से भी सहमत नहीं हैं कि वह ईरान से तेल लेना बंद कर दे क्योंकि विदेशमंत्री का यह दृष्टिकोण कि भारत केवल संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा लगाए गये प्रतिबंधों को स्वीकार करेगा इसके अतिरिक्त किसी भी देश के फ़ैसले के मानने के लिए भारत तैयार नहीं है इसीलिए ईरान से तेल लेने पर प्रतिबंध की धमकी अमरीका के व्यक्तिगत हितों पर आधारित बयान है जिसका विरोध अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए, साथ ही भारत को अमरीकी धमकी का जवाब, ईरान से कच्चे तेल का आयात जारी रखकर देना चाहिए।

इससे भारत के अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में शक्ति और उसके फ़ैसले की प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। फ़िलहाल भारत, ईरान से 320000 बैरल कच्चा तेल आयात कर रहा है। ईरान पर प्रतिबंधों के समय यह संख्या 190000 बैरल हो गयी थी, अर्थात प्रतिबंधों के दौर में भी भारत ने ईरान से तेल आयात को पूरी तरह ख़त्म नहीं किया था इसीलिए अमरीकी धमकियों की परिधि में भारत को इस आयात में कमी करने के बजाए इस संख्या को जारी रखना चाहिए ताकि उसकी स्वाधीनता और स्वतंत्रता की बेहतरीन कल्पना सार्वजनिक हो सके।

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान सरकार की विदेश नीति इस्राईल नवाज़ है जिसका प्रभाव भारत और ईरान के संबंधों पर भी पड़ेगा। यदि इस्राईल अमरीका के समर्थन में भारत पर ईरान से तेल आयात रोकने का दबाव बनाता है तो संभव है कि भारत इस बार ईरान से पूरी तरह तेल लेना बंद कर दे किन्तु इस फ़ैसले से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उसकी बहुत बदनामी होगी।

इस समय भारत के फ़ैसले पर पूरी दुनिया की नज़रें केन्द्रित हैं और भारत भी अच्छी तरह जानता है कि यदि वह इस्राईल नवाज़ी का प्रमाण देते हुए ईरान से अपने संबंधों को समाप्त करता है तो उसके स्पष्ट प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा जिसके बाद मंहगाई में वृद्धि होगी और आर्थिक ढांचा जो पहले ही बहुत कमज़ोर हो चुका है, और अधिक तबाह हो जाएगा, इसीलिए भारत को चाहिए कि वह अमरीकी धमकी के विरुद्ध अपने दृष्टिकोण पर अटल रहे और ईरान – भारत संबंधों को अधिक बेहतर बनाने का प्रयास करे।

साभार

आदिल फ़राज़

प्रख्यात भारतीय टीकाकार