भारत पाक तनावः क्या फिर कुछ बड़ा हो सकता है?
भारत और पाकिस्तान के बीच गत 14 फ़रवरी की पुलवामा घटना के बाद तनाव अपने चरम बिंदु पर पहुंच गया और दो हफ़्ते बाद यह प्रतीत हुआ कि दोनों देश युद्ध की कगार पर पहुंच गए हैं लेकिन फिर तनाव में कमी आई।
पाकिस्तान की ओर से भारतीय वायु सेना के गिरफ़तार पायलट को रिहा किए जाने के बाद तो यह लगने लगा कि हालात काफ़ी बेहतर हो गए हैं मगर अब जो बयान आ रहे हैं उसमें आशंका जताई जा रही है कि हालता फिर बिगड़ सकते हैं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस्लामाबाद में गुरुवार को कहा कि पाकिस्तान शांति के रास्ते पर निकल चुका है मगर भारत के चुनाव तक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भी यह बयान दिया कि ख़तरा टला नहीं है। उनका इशारा यह था कि भारत की ओर से फिर पाकिस्तान पर कोई हमला हो सकता है। हालांकि शाह महमूद क़ुरैशी इससे पहले बयान दे चुके थे कि तनाव टल चुका है और यह पाकिस्तान की सफल व सक्रिय कूटनीति की एक बड़ी कामयाबी है।
ख़तरा टला नहीं है और अब भी कुछ बड़ा हो सकता है इस विचार को सही ठहराने वाले टीकाकारों का मानना है कि हालिया टकराव में जो कुछ हुआ उससे पाकिस्तान तो संतुष्ट है मगर भारत कदापि संतुष्ट नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो दिल्ली की केन्द्र सरकार पर उनकी हमेशा यह कठोर टिप्पणी होती थी कि वह पाकिस्तान के मामले में कठोर कार्यवाही नहीं करती इसमें टालमटोल करती है। इसलिए अब जब उनके शासनकाल में वही स्थिति पैदा हुई तो मोदी पर भारी दबाव था कि वह कुछ बड़ा करके दिखाएं। नरेन्द्र मोदी की पार्टी के नेताओं की ओर से यहां तक कहा गया कि मोदी पर दबाव बनाया जाए कि वह पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कुछ ठोस क़दम उठाएं यह मुद्दा भी राम मंदिर वाले मुद्दे की तरह न हो जाए कि भाजपा केवल बयानबाज़ी करती रह गई उसने व्यवहारिक रूप से कुछ नहीं किया।
नरेन्द्र मोदी ने भारी दबाव में पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कार्यवाही भी की और बालाकोट में हमला कर दिया मगर उस हमले के बारे में किए गए दावों पर अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भी भी सवाल उठ गए। बाद में जो घटनाएं हुईं उनमें भारत का मिग-21 विमान मार गिराया गया और पायलट गिरफ़तार हो गया। इस तरह इस लड़ाई में पाकिस्तान का पलड़ा भारी हो गया। तो अब नरेन्द्र मोदी पर फिर दबाव है कि वह पाकिस्तान से हिसाब बराबर करें।
दूसरी बात यह भी कही जाती है कि भारत में आम चुनाव होने तक अगर कश्मीर में फिर कोई घटना हो जाती है और उस हमले की ज़िम्मेदारी कोई एसा गुट स्वीकार करता है जिसके फ़ुटप्रिंट पाकिस्तान में भी हैं तो नरेन्द्र मोदी पर फिर दबाव बढ़ जाएगा कि वह कोई न कोई कार्यवाही ज़रूर करें और एसी कार्यवाही करें कि इस बार पाकिस्तान का पलड़ा भारी न रहे बल्कि भारत का पलड़ा भारी हो जाए। क्योंकि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए इस बार के लोक सभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन कर पाना एक बड़ा चैलेंज बन गया है।
इसी वजह से पाकिस्तान में उच्चाधिकारियों के स्तर पर भी कहा जा रहा है कि जब तक भारत में चुनाव नहीं हो जाते उस समय तक इस बात की आशंका बनी रहेगी कि भारत पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही करे और अगर भारत की ओर से कार्यवाही होती है तो पाकिस्तान में इमरान ख़ान सरकार पर दबाव होगा कि वह भी जवाबी कार्यवाही करे और कार्यवाही का स्तर भी भारत के बरारब और उससे ज़्यादा हो।
इस तरह दोनों देश एक बार फिर आमने सामने हो जाएंगे और यह केवल दोनों देशों नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय होगा क्योंकि दोनों ही परमाणु हथियार संपन्न देश हैं।