भारत में लोक सभा चुनाव, फ़िलहाल अनिश्चितता ही दिखाई देती है
भारत में सात चरणों में हो रहा लोक सभा का चुनाव जहां भारतीय जनता के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसकी कई नीतियों और वादों पर संदेह की छाया आ गई है वहीं कांग्रेस के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसके विचार में भाजपा नीत सरकार देश को और देश की महत्वपूर्ण संस्थाओं को अलग दिशा और अलग स्थिति की ओर ले जा रही है।
भारतीय जनता पार्टी ने देश को मज़बूत सरकार और निर्णायक प्रधानमंत्री देने पर ज़ोर दिया। वर्ष 2014 में जब भाजपा नी गठबंधन राजग की सरकार बनी तो यह भाजपा की मज़बूत सरकार थी और नरेन्द्र मोदी को मज़बूत नेता के रूप में सामने लाया गया था। यहां तक तो भाजपा को सफलता मिली लेकिन मज़बूत सरकार और निर्णायक नेता के सत्ता में पहुंचने के बाद पांच साल के शासन काल में इस सरकार से मतदाताओं की अपेक्षाएं भी ज़्यादा थीं जो आम तौर पर एक कमज़ोर गठबंधन सरकार से नहीं रखी जातीं।
भाजपा से मतदाताओं को कई क्षेत्रों में बड़ी आशाएं थीं। सबसे अधिक आशा इस बात की थी कि भारतीय जनता पार्टी के शासन काल में भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। दूसरी आशा यह थी कि देश का विकास होगा। अब विकास बहुत व्यापक विषय है और इसके लिए समय की ज़रूरत होती है। जहां तक देश के विकास की बात है तो इसमें पांच साल दस साल ही नहीं इससे भी अधिक लग जाते हैं तब एसी स्थिति उत्पन्न होती है कि विकास नज़र आना शुरू होता है इस आयाम से प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना सही है कि जो काम कांग्रेस 70 साल में नहीं कर पाई वह मैं 5 साल में कैसे कर लेता। मगर भाजता की शासन शैली में समस्या यह है कि उसके प्रयासों, उसके फ़ैसलों, उसकी नीतियों, उसकी योजनाओं और उन्हें लागू करने के तौर तरीक़ों से यह संदेश नहीं दिया जा सका कि सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है और ईमानदारी से काम कर रही है।
भारत ही नहीं तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों की जनता की हालत यह है कि वह आम तौर पर यह महसूस करती है कि सरकारें आम जनमानस को ठग रही हैं मगर इनमें जब भी कोई सरकार मेहनत और ईमानदारी से काम करे तो उसे जनता के स्तर पर भी और संबंधित संस्थाओं के स्तर पर भी सराहा जाता है। आम लोग सरकार की ईमानदारी और मेहनत को महसूस करते हैं।
भाजपा के साथ यह हुआ कि सही नीतियां अपनाने, सही फ़ैसले करने, सटीक योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने में बड़ी कमियां नज़र आईं। चाहे नोटबंदी का मुद्दा हो, जीएसटी का मुद्दा हो, किसानों को उनकी फ़सल की उचित क़ीमत देने का मुद्दा हो, शिक्षा और शिक्षण संस्थानों का मुद्दा हो, हर जगह हर मामले में भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली से साफ़ ज़ाहिर हुआ कि उसके होमवर्क में कमी है और साथ ही उसे यह डर भी रहा कि यह कमी लोगों की ज़बान पर आम न होने पाए इसके लिए भाजपा ने आलोचकों के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख़ अपनाया। नतीजा यह हुआ कि भारतीय जनता पार्टी के नेता अपनी नीतियों का बचाव करने और भूल सुधार के बजाए अलग अलग मंचों और मैदानों में लोगों से लड़ते झगड़ते नज़र आए।
इस समय जब चुनाव चल रहा है तब भी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का स्वर और अंदाज़ वही है। अतः किसी को भी यह नहीं महसूस हो रहा है कि भाजपा को अपनी नीतियों की त्रुटियों का आभास है और वह भूल सुधार के लिए गंभीरता से प्रयास करना चाहती है।
कांग्रेस का मामला यह है कि भाजपा की नीतियों की कमज़ोरी और कमज़ोर फ़ैसलों और योजनाओं के चलते उसे अच्छा मौक़ा मिल गया है। कांग्रेस ने घोषणापत्र की हद तक तो काफ़ी मेहनत की है। प्रियंका गांधी को मैदान में उतारकर धमाका भी किया है लेकिन क्या उसके लिए यह लड़ाई जीत पाना संभव होगा? बहुत से टीकाकार यह मानते हैं कि कांग्रेस का निकम्मापन पिछले पांच साल में साफ़ तौर पर नज़र आया। आख़िर के कुछ महीनों में उसने मेहनत की है मगर क्या मतदाता इतने भर से संतुष्ट होंगे यह देखने वाली बात होगी।
इस बीच थर्ड फ़्रंट की सुगबुगाहट भी है और इसे लगातार बल मिल रहा है।