इमाम हसन अस्करी(अ) का जन्म दिवस
इस्लामी विचार धारा में इमामत का अर्थ है पैग़म्बरी का जारी रहना।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इमामत का अनुसरण इस्लामी राष्ट्र को आघातों व ख़तरों से बचाता है और मुसलमानों के कार्यों को बेहतरी प्रदान करता है। अतः सर्वसमर्थ व महान ईश्वर ने अपनी तत्वदर्शिता और लोगों की मार्गदर्शन की आवश्यकता के दृष्टिगत इमामों को ज़मीन पर अपना उत्तराधिकारी व हुज्जत बनाया है। शब्दकोष में हुज्जत का अर्थ तर्क है। पवित्र कुरआन, बुद्धि, समस्त पैग़म्बर, उनके उत्तराधिकारी और इसी प्रकार विद्वान और पथ प्रदर्शन करने वालों पर महान ईश्वर की ओर से हुज्जत हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” ज़मीन ईश्वर के उत्तराधिकारी से खाली नहीं होगी। या तो वह उत्तराधिकारी स्पष्ट रुप में सामने होगा या लोगों की नज़रों से ओझल रहेगा। ईश्वरीय रहस्य उन्हें प्रदान किया गया है और जो भी उनकी शरण में होगा वह सही रास्ते पर होगा वे ईश्वरीय ज्ञान के खज़ाने हैं और उसके धर्म के रक्षक हैं और इस्लाम पहाड़ की भांति उनके अस्तित्व से सीधा व मज़बूत होता है।"

232 हिजरी क़मरी में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का जन्म पवित्र नगर मदीना में हुआ। अब्बासी ख़लीफाओं की ज़बरदस्ती के कारण इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने पिता इमाम अली नक़ी अलैहिस्सलाम के साथ पवित्र नगर मदीना से सामर्रा चले गये। उस समय सामर्रा अब्बासी शासकों की राजधानी था। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की उम्र यद्यपि 28 वर्ष से अधिक नहीं थी परंतु उन्होंने मूल्यवान इस्लामी शिक्षाओं की बहुत यादगारें छोड़ी है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की विशेषताओं की व्याख्या में कहा गया है कि आप बहुत ही विनम्र और दयावान थे इस प्रकार से कि लोग उनसे मुलाकात से प्रभावित हो जाते थे। इतिहास में एसे लोगों के नामों का उल्लेख है जो अनभिज्ञता के कारण आंरभ में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम से दूर रहते थे परंतु इमाम से मुलाक़ात के बाद वे लोग परिवर्तित हो गये और इमाम अलैहिस्सलाम के चाहने वालों की पंक्ति में शामिल हो गये। इनमें से दो व्यक्ति एसे थे जिन्हें जेल में इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को यातना देने के लिए नियुक्त किया गया था। पर जब इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अब्बासी शासकों की जेल में थे तो जेलकर्मी इमाम को संगत के कारण परिवर्तित हो गये।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की इमामत का समय लगभग 6 साल था और उसका अधिकांश भाग इमाम ने जेल में गुज़ारा। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के काल में तीन अब्बासी शासकों मोअतज़, मोहतदी और मोअतमिद की सरकारें थीं। उस समय बहुत घुटन का माहौल था जिसकी वजह से इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को बहुत कम समय मिल पाता था कि वह ज्ञान की सभाओं का आयोजन कर सकें और बड़ी कठिनाई से लोगों से संपर्क स्थापित कर पाते थे। इस आधार पर इमाम अलैहिस्सलाम पत्राचार से लोगों के लिए धार्मिक शिक्षाओं को बयान करते थे। इब्ने सब्बाग़ के नाम से प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान अली बिन मोहम्मद मालेकी इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के बारे में इस प्रकार कहते हैं" इमाम अपने समय में अद्विर्तीय थे और कोई भी उनके बराबर नहीं था और वह अपने ज्ञान से लोगों की समस्याओं का समाधान करते थे। इसी प्रकार इमाम अपनी शक्तिशाली सोच से वास्तविकताओं को स्पष्ट करते थे।"

इतिहासकार इस बात पर सहमत हैं कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपने समय में ज्ञान सहित समस्त विशेषताओं में सर्वश्रेष्ठ थे।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की इमामत का समय अब्बासी सरकारों की सबसे अशांति का दौर था। अब्बासी खलीफाओं की अयोग्यता, दरबारियों के मध्य असमंजस, लोगों की अप्रसन्नता, एक के बाद दूसरे आंदोलन और दिग्भ्रमित विचारों का विस्तृत हो जाना उस समय की राजनीतिक और सामाजिक समस्याएं थीं। अब्बासी शासक लोगों का शोषण करते थे और लोगों के धन से भव्य महलों का निर्माण करते थे और लोगों की दुर्दशा पर कोई ध्यान नहीं देते थे। अब्बासी शासकों की सरकारों की ओर से कठिन सीमाओं के बावजूद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम अपनी इमामत के छोटे से दौर में एसे शिष्यों का प्रशिक्षण किया जिनमें से हर एक ने इस्लामी धर्म व संस्कृति के प्रचार- प्रसार में ध्यान योग्य भूमिका निभाई है। इमाम के शिष्यों की संख्या 100 से अधिक बताई गयी है जिसमें कुछ ने उल्लेखनीय कार्य अंजाम दिया है। उस समय कूफा, बगदाद, नीशापूर, कुम, खुरासान, यमन, रैय, आज़रबाइजान और सामर्रा जैसे क्षेत्र शीयों के गढ़ समझे जाते थे। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने इस्लाम के प्रचार- प्रसार के लिए उन क्षेत्रों के लोगों को पत्र लिखे हैं। जैसे इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने कुम और नीशापूर के शीयों के नाम जो पत्र लिखे हैं उनकी विषय वस्तु एतिहासिक पुस्तकों में मौजूद हैं। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने ज्ञान के विकास और इस्लामी आस्थाओं की रक्षा के लिए किताबें भी लिखी हैं। इमाम ने जो किताबें लिखी हैं उनमें पवित्र कुरआन के कुछ सूरों की व्याख्यायें भी हैं। इमाम ने जो दूसरी किताब लिखी हैं वह धर्म के हलाल और हराम आदेशों के बारे में है। इमाम अलैहिस्सलाम सदैव उन लोगों की प्रशंसा करते थे जो एसी किताबें लिखते थे जो समाज में ज्ञान के प्रचार- प्रसार का कारण बनें।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के जीवन का महत्वपूर्ण बिन्दु उनके बेटे का जन्म है। लोगों तक यह बात पहुंच गयी थी कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के बेटे हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम ही पूरी दुनिया से अत्याचार का अंत करके उसे न्याय से भर देंगे। वह महामुक्तिदादा हैं और उनके आंदोलन से पूरी दुनिया से अत्याचार का अंत हो जायेगा। अतः अब्बासी शासक महामुक्ति दाता के दुनिया में आने से चिंतित थे। उन सब ने महामुक्तिदाता के जन्म से संबंधित हदीसों को सुन रखा था। यह हदीस बहुत अधिक सुन्नी मुसलमानों की किताबों में आई है कि पैग़म्बरे इस्लाम के उत्तराधिकारी 12 हैं और सबके सब क़ुरैश से हैं। इसी प्रकार हदीसों में जो यह आया है कि मेहदी क़ुरैश या हज़रत फातेमा की संतान में से होंगे इस बात का भी उल्लेख सुन्नी मुसलमानों की विश्वस्त किताबों में बहुत अधिक है। अतः अब्बासी शासक इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम पर कड़ी नज़र रखते थे। क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के 11वें उत्तराधिकारी हैं और महामुक्तिदाता के आने का समय निकट है। अब्बासी शासकों ने इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के साथ इतनी कड़ाई की कि कार्यक्रम के अनुसार इमाम को सप्ताह के कुछ विशेष दिनों में उनकी सरकार के केन्द्र में हाज़िर होना या उन्हें अब्बासी शासकों के जेल में रहना पड़ता था परंतु अब्बासी शासकों की कड़ी निगरानी के बावजूद महान ईश्वर का वचन पूरा हुआ और इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम के बेटे महामुक्ति दाता इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम का जन्म हुआ।
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे के जन्म को गुप्त रखा। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर दुश्मनों को इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम के जन्म की सूचना मिल जाती तो संभव था कि उनकी हत्या के बारे में निर्णय लेते। इसके बावजूद इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने अपने विश्वासपात्र कुछ विशेष लोगों को अपने बेटे के जन्म की सूचना दे दी थी और कुछ लोगों को अपने बेटे को दिखाया था ताकि लोग उनकी शहादत के बाद अपने इमाम को पहचानने के बारे में परेशान न हों। इसी कारण इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद इमाम के विशेष साथी व अनुयाई इस बात पर सहमत थे कि इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे को अपने बाद अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया है। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम का एक अन्य सोचा- समझा कदम यह था कि उन्होंने लोगों के ज़ेहनों को 12वें इमाम के नज़रों से ओझल होने के बारे में तैयार कर दिया था। क्योंकि 12वें इमाम के नज़रों से ओझल होने का मामला सामान्य विषय नहीं था और उसके लिए लोगों के ज़ेहनों को तैयार होना ज़रूरी था। उस समय तक पैग़म्बरे इस्लाम और उनके पवित्र परिजनों से प्रेम करने वाले प्रत्यक्ष रूप से इमामों की सेवा में हाज़िर होते और उनके समक्ष अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं को रखते थे। इस प्रकार लोग इमामों से सीधे संपर्क के आदी थे। अतः इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम को चाहिये था कि वह समाज को इमाम की ग़ैबत अर्थात नज़रों से ओझल होने की परिस्थिति के लिए तैयार करते। इमाम के नज़रों से ओझल होने का अर्थ यह है कि लोग सीधे रूप से इमाम से संपर्क नहीं कर सकते। इसलिए इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने अपने कुछ साथियों का प्रशिक्षण इस प्रकार किया कि वे इमाम के ग़ायब होने के बाद की ज़िम्मेदारियों का निर्वाह कर सकें। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम विभिन्न तरीक़ों से लोगों का आह्वान करते थे कि वे 12वें इमाम के ग़ायब होने के समय में विद्वानों, धर्मशास्त्रियों और उन हदीसों को लिखने व बयानों करने वालों से संपर्क करें जो हलेबैत के अनुयाई हैं और उनसे धार्मिक शिक्षाओं व आदेशों को समझें। इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की प्रसिद्ध उस हदीस को इसी दिशा में जा सकता है जिसमें आपने फरमाया है कि जो धर्मशास्त्री संयमी हो, अपने आपको बुराइयों से सुरक्षित रखे,धर्म का रक्षक हो, अपनी इच्छाओं का विरोध करे और अपने मौला के आदेश का पालन करे तो सामान्य लोगों को चाहिये कि उसका अनुसरण करें।“
इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम की एक विशेषता अत्याचारी शासकों के सामने नतमस्तक न होना थी। इमाम अलैहिस्सलाम इस्लाम ने इस्लाम की विशुद्ध शिक्षाओं के प्रचार- प्रसार में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं लिया। अब्बासी शासक मोअतमिद समाज में इमाम के शैक्षिक व आध्यात्मिक प्रभाव से भली-भांति अवगत था। वह देख रहा था कि समाज के विभिन्न वर्गों के लोग इमाम को दूसरों पर प्राथमिकता देते हैं। उसने सोचा कि अगर यह स्थिति जारी रहती है तो उसकी अत्याचारी सरकार के स्तंभ कमज़ोर हो जायेंगे। इस कारण उसने इमाम को अपने रास्ते से हटाने का निर्णय किया। जब इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम इस दुनिया से परलोक सिधारे तो उनकी उम्र 28 साल से अधिक नहीं थी और इमाम हसन अस्करी अलैहिस्सलाम ने एक एसा बेटा छोड़ा जो उस समय ईश्वर के आदेश से लोगों की नज़रों के सामने प्रकट होगा जब पूरी दुनिया अत्याचार से भर चुकी होगी और वह अत्याचार को खत्म करके पूरी दुनिया को न्याय से भर देगा। इमाम फरमाते हैं” हम उन लोगों की शरण हैं जो हमारी शरण में आयें और हम उन लोगों के लिए प्रकाश हैं जो हमसे प्रकाश व जानकारी चाहें। जो हमें दोस्त रखेगा वह स्वर्ग के ऊंचे दर्जे में हमारे साथ रहेगा”