यूक्रेन संकट पश्चिम के नैतिक पतन का नतीजा है, हसन नसरुल्लाह
हिज़्बुल्लाह के महासचिव हसन नसरुल्लाह ने यूक्रेन संकट को पश्चिम के नैतिक पतन का नतीजा बताया है।
मंगलवार को अपने एक संबोधन में नसरुल्लाह ने यूक्रेन पर रूस के हमले का मुद्दा उठाया और कहा कि यह ताज़ा संकट पश्चिम के नैतिक पतन का नतीजा है।
उन्होंने कहा कि फ़िलिस्तीन एक ऐसा इलाक़ा है, जहां अत्यधिक अत्याचार हो रहा है। इस्राईल ने लगातार युद्धों के अलावा, पिछले 15 साल से ग़ज्ज़ा पट्टी की नाकाबंदी कर रखी है। इसके बावजूद, सुरक्षा परिषद और पश्चिम देश एक शब्द नहीं बोल रहे हैं। क्योंकि अमरीका की नज़र में मानवीय मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का कोई महत्व नहीं है, इसीलिए अमरीका न केवल इस्राईल के अत्याचारों की निंदा नहीं करता है, बल्कि सुरक्षा परिषद में फ़िलिस्तीन के मुद्दे को उठने ही नहीं देता है।
उन्होंने कहा कि सिर्फ़ इक्कीसवीं सदी में अमरीका ने दो देशों अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर हमला किया, सीरिया संकट में हस्तक्षेप किया और उसके एक इलाक़े पर क़ब्ज़ा कर लिया। युद्धों के साथ ही अमरीका ने ईरान के जनरल क़ासिम सुलेमानी समेत दूसरे देशों के अधिकारियों की हत्याएं की, लेकिन उसे इन अपराधों के लिए सज़ा नहीं दी गई।
इसके अलावा अमरीका और पश्चिम के अत्याचारों की एक दूसरी मिसाल यमन है। अमरीका और यूरोपीय देशों के सीधे समर्थन से सऊदी सैन्य गठबंधन ने 2015 में यमन के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ दिया और मानव इतिहास की सबसे भंयकर त्रासदी और संकट को जन्म दिया। यमन युद्ध को 7 साल पूरे हो रहे हैं और यह पश्चिम के नैतिक पतन के सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक है।
हिज़्बुल्लाह के महासचिव का कहना था कि यमन की पिछले सात वर्षों से घेराबंदी जारी है और इस देश की पीड़ित जनता तक खाद्य सामग्री और ईंधन तक पहुंचने नहीं दिया जा रहा है। इसके बावजूद, दुनिया ने यमन संकट की ओर से आंखें मूंद रखी हैं, क्यों? क्या इसलिए कि यमन के लोग गोरी चमड़ी के नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि यह सभी मिसालें पश्चिमी जगत के नैतिक पतन को साबित करते हैं। क्योंकि यह वह देश हैं, जो शरणार्थियों के साथ भी नस्ल, रंग और धर्म के आधार पर भेदभाव करते हैं।
हसन नसरुल्लाह का मानना है कि हालिया यूक्रेन संकट ने पश्चिम के नैतिक पतन से पूरी तरह से पर्दा उठा दिया है।