संकटों में फंसता जा रहा है तालिबान का अफ़ग़ानिस्तान
तालिबान सरकार के रक्षा मंत्री ने दोहा की अपनी यात्रा के दौरान, क़तर के अमीर के साथ मुलाक़ात में द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार विमर्श किया है।
तालिबान के रक्षा मंत्री मुल्लाह मोहम्मद याक़ूब ने क़तर के अमीर तमीम बिन हमद अल-सानी से मुलाक़ात की और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की। हालांकि तालिबान सरकार ने इस मुलाक़ात की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।
पिछले हफ़्ते तालिबान के विदेश मंत्री अमीर ख़ान मुतक्क़ी ने भी क़तर की यात्रा की थी और दोहा में यूरोपीय और अमरीकी राजनयिकों से मुलाक़ात की थी। मुल्लाह याक़ूब भी दोहा में यूरोपीय और अमरीकी राजनयिकों से मुलाक़ात कर सकते हैं।
तालिबान के रक्षा मंत्री की क़तर यात्रा ऐसी स्थिति में हो रही है, जब अफ़ग़ानिस्तान को विभिन्न संकटों का सामना है। ऐसा अनुमान है कि तालिबान के अधिकारियों की दोहा यात्राओं से अफ़ग़ानिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता का रास्ता खुलेगा।
अफ़ग़ानिस्तान ईंधन, खाद्य सामग्री और दवाओं जैसी बुनियादी ज़रूरत की चीज़ों के संकट का सामना कर रहा है। तालिबान के काबुल की सत्ता संभालने के बाद से दशकों से युद्ध झेल रहे इस देश में संकट अधिक गहराता जा रहा है। मौजूदा संकट ने तालिबान को भी संकट में डाल दिया है।
अंतर्राष्ट्रीय समुदाय विशेष रूप से पश्चिमी देशों के लिए अफ़ग़ान जनता की कठिन और चिंताजनक स्थिति स्पष्ट है, इसके बावजूद इस देश के लिए मानवीय सहायता उतनी नहीं है, जितनी उसे ज़रूरत है। कुछ लोगों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान की जनता के लिए भेजी जाने वाली सहायता से इस देश में तालिबान की स्थिति मज़बूत हो सकती है। हालांकि अफ़ग़ानिस्तान में भोजन और आवश्यक वस्तुओं की क़ीमतें इतनी ज़्यादा बढ़ गई हैं कि ज्यादातर लोग उन्हें ख़रीदने में असमर्थ हैं।
विश्व खाद्य कार्यक्रम के एक अधिकारी डेविड बेज़ले इस संबंध में कहते हैः अफ़ग़ानिस्तान की कम से कम आधी आबादी को गंभीर भूख के संकट का सामना है। अफ़गानिस्तान के लोगों को तत्काल मानवीय सहायता की ज़रूरत है, और यदि यह सहायता प्रदान नहीं की गई तो यह देश एक बड़े मानवीय संकट में फंस जाएगा।
तालिबान ने देश में एक व्यापक राष्ट्रीय सरकार के गठन का वादा किया था, लेकिन लगभग एक साल बीत रहा है, उसने अपना यह वादा पूरा करने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया है। यही वजह है कि तालिबान सरकार को अंतरराष्ट्रीय समुदाय औपचारिकता प्रदान नहीं कर रहा है।
ऐसा लगता है कि जब तक तालिबान देश की राजनीतिक व्यवस्था में नर्मी नहीं दिखायेंगे तो विश्व समुदाय भी उस वक़्त तक अफ़ग़ानिस्तान की समस्याओं को लेकर कुछ ज़्यादा लचक दिखाने वाला नहीं है।