सऊदी अरब में मानवाधिकारों के हनन की अस्ली वजह क्या है?
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अमेरिका में सऊदी अरब की राजदूत रीमा बिन्ते बंदर आले सऊद ने सीएनएन से साक्षात्कार में कहा है कि सऊदी अरब में जो सुधार कार्य हो रहे हैं वे वास्तविक हैं और सऊदी अरब ने गत पांच वर्षों के दौरान जो कार्य किये हैं उसे गत 80 सालों में अंजाम नहीं दिया गया है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Oct ३१, २०२२ १५:०७ Asia/Kolkata

अमेरिका में सऊदी अरब की राजदूत रीमा बिन्ते बंदर आले सऊद ने सीएनएन से साक्षात्कार में कहा है कि सऊदी अरब में जो सुधार कार्य हो रहे हैं वे वास्तविक हैं और सऊदी अरब ने गत पांच वर्षों के दौरान जो कार्य किये हैं उसे गत 80 सालों में अंजाम नहीं दिया गया है।

इस बयान की प्रतिक्रिया में यूरोपीय और सऊदी अरब के मानवाधिकार संगठनों व संस्थाओं ने सऊदी युवराज के सुधार कार्यों को झूठ बताया है। मोहम्मद बिन सलमान वर्ष 2017 में सऊदी अरब के युवराज बन गये। बिन सलमान ने पिछले पांच वर्षों के दौरान सामाजिक स्तर पर कुछ सीमिततायें खत्म कर दीं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने सऊदी अरब की महिलाओं को गाड़ी चलाने की अनुमति दे दी। इसी प्रकार उन्होंने कंसर्ट आयोजित करने की और स्टेडियम में जाकर फूटबाल देखने की भी अनुमति दे दी।

बिन सलमान एसी स्थिति में इन कार्यों को सुधार का नाम दे रहे हैं जब इनमें से कुछ कार्यों को हर नागरिक का प्राथमिक अधिकार समझा जाता है। साथ ही सऊदी युवराज ने महिलाओं की राजनीतिक स्वतंत्रता के बारे में कुछ भी अंजाम नहीं दिया। महत्वपूर्ण विषय यह है कि राजनीतिक टीकाकार बिन सलमान को न केवल सुधारक नेता नहीं मानते बल्कि उन्हें मानवाधिकारों का अस्ली हननकर्ता मानते हैं।

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस देश में राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि सऊदी अरब एक रूढ़िवादी देश में परिवर्तित हो जायेगा। बाइडेन के बयान का मूल कारण यह था कि सऊदी अरब की तानाशाही सरकार खुल्लम खुल्ला मानवाधिकारों का हनन करती है। इस आधार पर सुधार पर आधारित सऊदी युवराज के दावे को रियाज़ के करीबी घटक भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

रोचक बात यह है कि सऊदी युवराज ने सामाजिक स्तर पर जहां कुछ सीमितताओं को खत्म कर दिया है वहीं राजनीतिक क्षेत्र में कुछ सीमितताओं में वृद्धि कर दी है। सऊदी अरब में खुद इस देश के नागरिकों के साथ भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण व्यवहार होता है। मिसाल के तौर पर शियाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होता है, उन्हें सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता है। इसी प्रकार शियों पर निराधार आरोप लगाकर उन्हें जेलों में बंद कर दिया जाता है।

आज आधिकारिक तौर पूरे विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि कितने शिया सऊदी अरब की जेलों में बंद हैं। पिछले मार्च महीने में 81 शिया जवानों को सऊदी अरब में फांसी दे दी गयी। जिन जवानों को फांसी दी गयी उन पर आतंकवादी कार्यवाहियों में लिप्त होने का निराधार आरोप लगाया था और सऊदी अरब की सरकार ने अपने निराधार व मनगढंत दावों को सिद्ध करने के लिए आजतक कोई सुबूत पेश नहीं किया।

शोचनीय बिन्दु यह है कि मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वाले अमेरिका और उसके पिछलग्गू देश व शक्तियों ने पूरी तरह अर्थपूर्ण चुप्पी साध ली। ये वे देश व शक्तियां हैं जो अगर ईरान में एक जवान लड़की मर जाती है तो ज़मीन- आसमान एक कर देती हैं और एसा दुष्प्रचार करती हैं कि जैसे ईरान में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है जबकि खुद अपने और अपने पिछलग्गू देशों में बड़ा से बड़ा मानवाधिकारों का हनन होता है लोगों के सिर कलम किये जाते हैं वहां ये देश और शक्तियां पूरी तरह चुप्पी साध लेते हैं।

इन देशों को बहुत अच्छी तरह पता है कि ईरान में मानवाधिकार का हनन नहीं होता है वे अपने कृत्यों से आम जनमत का ध्यान हटाने के लिए ईरान में मानवाधिकारों के हनन का राग अलापते हैं। बहरहाल सऊदी अरब में मानवाधिकारों का जो हनन हो रहा है वह बड़ी शक्तियों और उसके आक़ाओं के समर्थन व आर्शीवाद का परिणाम है। MM

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