इस्राईल आर्थिक और राजनीतिक संकट की ओर बढ़ रहा है
अवैध अधिकृत फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों या इस्राईल में न्यायिक सुधारों पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है और इस योजना के विरोधियों और समर्थकों के बीच जारी टकराव के दौरान, सरकार की गुणवत्ता के लिए आंदोलन नामक एक संगठन ने ज़ायोनी प्रधान मंत्री बेंजामिन नेतनयाहू के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दाख़िल की है।
इस याचिका के मुताबिक़, नेतनयाहू उन क़ानूनों का उल्लंघन करने की कोशिश कर रहे हैं, जो उन्हें उनके ख़िलाफ़ चल रहे भ्रष्टाचार के मुक़दमे से जुड़े मामलों में दख़ल देने से रोकते हैं। इस आंदोलन ने ज़ायोनी शासन के सर्वोच्च न्यायालय से नेतनयाहू को प्रधान मंत्री पद के लिए अपात्र घोषित करने के लिए कहा है।
सरकार की गुणवत्ता के लिए आंदोलन नेतनयाहू के मंत्रिमंडल की न्यायिक सुधार योजना पर केंद्रित है, जो न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करना चाहता है। सोमवार को पहली बार ज़ायोनी संसद नेसेट में इस पर मतदान होने की संभावना है। सरकार की गुणवत्ता के लिए आंदोलन की याचिका को स्वीकार करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने नेतनयाहू को अपना पक्ष रखने के लिए एक महीने का समय दिया है।
नेतनयाहू की कैबिनेट में न्याय मंत्री यारियो लेविन द्वारा इस्राईल में न्यायिक सुधार योजना पेश किए जाने के बाद, इसकी व्यापक आलोचना हुई और इसके ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला जारी है।
इस योजना का उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय सहित न्यायाधीशों की नियुक्ति पर सरकार को पूर्ण नियंत्रण देना, अदालत की शक्ति को सीमित करना और संसद को सिर्फ़ एक वोट के बहुमत से उन क़ानूनों को फिर से बहाल करने में सक्षम बनाना है, जिन्हें अदालत ने रद्द कर दिया हो।
छठी बार सत्ता पर क़ब्ज़ा करने वाले नेतनयाहू का कहना है कि न्यायपालिका ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान, अपनी हदें लांघी हैं।
नेतनयाहू के नेतृत्व वाले सत्तारूढ़ गंठबंधन के नेताओं का आरोप है कि वास्तव में सरकार की गुणवत्ता के लिए आंदोलन नेतनयाहू की सरकार को गिराने की एक साज़िश है और इसमें और सैन्य तख़्तापलट में कोई अंतर नहीं है। किसी भी ताक़त को यहां तक कि सर्वोच्च अदालत को इसका अधिकार नहीं है, सिर्फ़ जनता ही यह फ़ैसला कर सकती है कि सत्ता की चाबी किसके हाथ में रहेगी।
इस्राईल में पिछले कई वर्षों से जारी राजनीतिक गतिरोध गहराता जा रहा है, जिसके नतीजे में पिछले चर वर्षों के दौरान 5 आम चुनावों का आयोजन हुआ। अर्थशास्त्रियों और उद्यमियों का मानना है कि अगर मौजूदा राजनीतिक टकराव जारी रहता है तो निकट भविष्य में ज़ायोनी शासन को गंभीर आर्थिक और राजनीतिक संकट झेलना पड़ सकता है।