नेतन्याहू की कलई खुलती जा रही है
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के वार्षिक अधिवेशन में नेतन्याहू के हालिया बयानों की कई आयामों से आलोचना की जा सकती है।
सबसे पहली बात तो यह है कि नेतन्याहू का यह भाषण और सामान्य रूप से संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा की वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए उनकी यात्रा ने जो प्रधान मंत्री का पद पुनः हासिल करने ने और दक्षिणपंथी कैबिनेट बनाने के बाद उनकी अमेरिका की पहली यात्रा भी थी, ज़ाहिर कर दिया कि नेतन्याहू न केवल ज़ायोनी शासन के अंदर ही नहीं बल्कि बाहर भी अपनी छवि और विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं।
वास्तव में उनकी कलई सबके सामने खुलती जा रही है और यहां तक कि एलन मस्क ने भी अपने बयानों में स्वीकार किया कि उन्हें ईरान के ख़िलाफ़ नेतन्याहू की बदनामी पर विश्वास नहीं है क्योंकि ईरानी अधिकारियों का एक बहुत ही विनम्र पत्र सैटेलाइट इंटरनेट को स्टारलिंक पर सक्रिय करने के नियमों के बारे में प्राप्त हुआ है।
दूसरी बात यह कि नेतन्याहू जिसे वह नए मध्यपूर्व के रूप में दिखाने की कोशिश करते हैं, उसका नया नक्शा दिखाकर दर्शकों और मीडिया का मज़ाक का पात्र बने और साथ ही उन्होंने ने सऊदी अरब के लिए भी अपनी मुट्ठियां खोल दीं क्योंकि नेतन्याहू का नया नक्शा सऊदी अरब के साथ प्रस्तावित शांति योजना का खुला उल्लंघन है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के वार्षिक अधिवेशन में अपने भाषण में नेतन्याहू ने पश्चिम एशिया यानी मध्यपूर्व का एक नया नक्शा पेश किया जिसमें स्वतंत्र फ़िलिस्तीनी राज्य के गठन या अतिग्रहित सीरिया के गोलान क्षेत्र की वापसी का कोई ज़िक्र तक नहीं है।
यह वही नक्शा है जिसे नेतन्याहू ने डोनल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में तैयार किया था और वेस्ट बैंक और गोलान सहित 1967 के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों पर स्थायी क़ब्ज़े को मंजूरी दी थी, जिसे 1948 के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों को इस्राईल के नाम से जाना जाता था। नेतेन्याहू ने इस संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के वार्षिक अधिवेशन में यह नक़्शा दिखा कर दुनिया की स्वीकृति हासिल करने की कोशिश की जिसमें वह बुरी तरह से नाकाम रहे।
अगर इससे पहले तक सऊदी अरब ही ने ज़ायोनी शासन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने के लिए नियम और शर्तें तय की थीं, लेकिन अब ऐसा लगता है कि नेतन्याहू ने पश्चिम एशिया का अपना वांछित नक्शा पेश करके सऊदी पक्ष को यह संदेश दे दिया है कि दोनों पक्षों के बीच संबंध 1967 के क़ब्ज़े वाली भूमि पर इस शासन की स्थायी संप्रभुता की पुष्टि करेंगे।
लेकिन नेतन्याहू की नई योजना न केवल 1967 के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों से ज़ायोनी शासन की बिना शर्त वापसी के संबंध में संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों 242 और 338 का उल्लंघन करती है, बल्कि फिलिस्तीनी मुद्दे के समाधान के लिए सऊदी अरब के दिवंगत नरेश अब्दुल्ला द्वारा प्रस्तावित शांति योजना का भी उल्लंघन है।
इसके आधार पर अगर सऊदी अरब और मोहम्मद बिन सलमान, पश्चिम एशिया के लिए नेतन्याहू की नई योजना को स्वीकार करना चाहते हैं तो उन्हें इस देश की पिछली शांति योजना को अलविदा कहना होगा जिसके कोई संकेत नहीं दिखे हैं कि वह इस तरह का ख़तरा उठाना चाहते हैं। (AK)
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