वीटो , अत्याचार का हथौड़ा है
इस्राईल के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का शुक्रिया अदा किया है।
गज्जा में युद्ध विराम कराने के संबंध में प्रस्ताव का अमेरिका द्वारा वीटो किये जाने पर राष्ट्रसंघ में इस्राईली राजदूत गिलआद अरदान ने कहा कि हमारे साथ खड़ा होने के कारण हम अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का शुक्रिया अदा करते हैं। इसी प्रकार उन्होंने दोबारा राष्ट्रसंघ पर हमला किया और राष्ट्रसंघ के दृष्टिकोण को पक्षपात पर आधारित बताया और कहा कि बड़े शाक की बात है कि दक्षिणी गज्जा के अंदर से हमास जायोनी कस्बों की ओर राकेट फायर करता है परंतु राष्ट्रसंघ मामले की जांच कराये जाने की मांग करता है और हमास की भर्त्सना तक नहीं करता।
इसी प्रकार जायोनी विदेशमंत्री ने भी एक बार फिर राष्ट्रसंघ के महासचिव पर हमला किया और दावा किया कि राष्ट्रसंघ के महासचिव हमास के साथ खड़े हैं और उनका दृष्टिकोण राष्ट्रसंघ के लिए एक धब्बा है।
इसी बीच जायोनियों के अवैध कब्ज़े से अपनी मातृभूमि की आज़ादी के लिए लड़ने वाले हमास ने उन देशों का शुक्रिया अदा किया है जिन्होंने गज्जा में युद्धविराम कराये जाने के संबंध में सुरक्षा परिषद में पेश किये जाने वाले प्रस्ताव के पक्ष में मत दिया।
ज्ञात रहे कि शुक्रवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में गज्जा में युद्धविराम कराने के संबंध में संयुक्त अरब इमारात के सुझाव पर एक प्रस्ताव पेश किया गया था जिसके पक्ष में 13 वोट पड़े थे जबकि सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों में से केवल अमेरिका ने इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया जिसकी वजह से यह प्रस्ताव पारित न हो सका। ब्रिटेन ने वोटिंग में हिस्सा ही नहीं लिया।
जानकार हल्कों का मानना है कि अमेरिका द्वारा युद्ध विराम के प्रस्ताव का वीटो किया जाना पश्चिमी डेमीक्रेसी का एक नमूना है और अमेरिका ने अपने कृत्यों से ग़ैर कानूनी व अवैध जायोनी सरकार को फिलिस्तीन के मज़लूम लोगों के और खून बहाने का परमिशन दे दिया है।
इसी प्रकार इन हल्कों का मानना है कि आज दुनिया में शांति व सुरक्षा स्थापित करने में राष्ट्रसंघ व सुरक्षा परिषद अपने दायित्वों का जो निर्वाह नहीं कर पा रहे हैं वह स्वयं सुरक्षा परिषद के ढांचे में मौजूद कमियां हैं और जिनमें से एक वीटो का अधिकार है। आज वीटो का अन्यायपूर्ण अधिकार ही फिलिस्तीन के हज़ारों मज़लूम व निर्दोष लोगों की हत्या का कारण बना है।
गज्जा में युद्ध बंद कराने के संबंध में पेश किये गये प्रस्तावों का अमेरिका द्वारा दो बार वीटो किया जाना इस बात का ज्वलंत प्रमाण है कि जिस सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ का गठन दुनिया में शांतिं व सुरक्षा के लिए किया गया है आज उसी सुरक्षा के ढांचे में एसी कमियां व भेदभावपूर्ण कानून मौजूद हैं जिनकी वजह से अत्याचारियों का हाथ खुला हुआ है और पूरी दुनिया के लोग व देश चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। अगर सुरक्षा परिषद के समस्त सदस्य देशों को समान अधिकार प्राप्त होता और उनके वोटों का कोई महत्व होता तो 13 के मुकाबले में एक वोट यानी अमेरिका के वीटो को महत्व न दिया जाता।
कितनी अजीब बात है कि दुनिया में डेमोक्रेसी का सिद्धांत माना जाता है और पश्चिमी व यूरोपीय देश स्वयं को मानवाधिकार और डेमोक्रेसी का रक्षक बताते हैं और जब सुरक्षा परिषद में डेमोक्रेसी की बात आती है तो इसकी अनदेखी व उपेक्षा करके वीटो के अधिकार का प्रयोग किया जाता है। इसलिए जानकार हल्कों का कहना है कि सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ के ढांचे में सुधार की आवश्यकता का आभास अब हर समय से अधिक किया जा रहा है और वीटो के अधिकार को खत्म किया जाना चाहिये और यह वह बात है जिसका अब तक दुनिया के विभिन्न देशों के नेता मांग कर चुके हैं।
इसी प्रकार जानकार हल्कों का मानना है कि अब तक जो लोग अमेरिका को मानवाधिकार का समर्थक समझते थे अब उनकी आंखें खुल जानी चाहिये और यह वही अमेरिका है जिसने वर्ष 1945 में जापान के हिरोशीमा और नागासाकी पर परमाणु बम मारा था जिसमें दो लाख से अधिक लोग मारे गये थे और इस महाअपराध के लिए अमेरिका ने आज तक जापान से माफी तक नहीं मांगी है। MM
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