सऊदी अरब के समर्थन से आले ख़लीफ़ा की दमनकारी नीतियां जारी
बहरैन में राजनैतिक विरोधियों के दमन में वृ्द्धि और जेल अधिकारियों के बुरे रवैये के चलते इस देश के राजनैतिक बंदियों ने जेल में भूख हड़ताल शुरू कर दी है।
बहरैन में फ़रवरी 2011 से आले ख़लीफ़ा सरकार के विरुद्ध जनता ने आंदोलन आरंभ किया है। बहरैन की जनता स्वतंत्रता, न्याय की स्थापना, भेदभाव की समाप्ति और सत्ता एक निर्वाचित सरकार के हवाले किए जाने की मांग कर रही है। उसकी इस मांग का आले ख़लीफ़ा सरकार ने, जिसे सऊदी अरब के नेतृत्व में फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद का भरपूर समर्थन प्राप्त है, हमेशा दमन के माध्यम से जवाब दिया है। इसके लिए बहरैन की सरकार ने सऊदी अरब के हज़ारों सैनिकों को अपनी सहायता के लिए बुला रखा है।
बहरैन में सऊदी अरब का दमनकारी हस्तक्षेप एेसी स्थिति में है कि जब आले सऊद स्वयं भी अपने विरोधियों का बहुत अधिक दमन कर रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में सऊदी अरब के मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि इस देश की जेलों में हज़ारों की संख्या में सरकार विरोधी बंद हैं। इससे यह वास्तविकता एक बार फिर स्पष्ट होती है कि सऊदी अरब, बहरैन जैसी अपनी पिट्ठू सरकारों पर अपनी नीतियां थोप कर अपनी तानाशाही नीतियों को फैलाने का प्रयास कर रहा है।
इस बीच मानवाधिकारों की रक्षा की अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं सऊदी अरब और बहरैन के मानवाधिकार विरोधी क्रियाकलाप की पोल खोल कर इन देशों में नागरिकों विशेष कर राजनैतिक कार्यकर्ताओं के अधिकारों के हनन को रोकने का प्रयास कर रही हैं। यह एेसी स्थिति में है कि जब रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब व बहरैन की तानाशाही सरकारों ने पिछले पांच बरसों में जनता का जितना भी दमन किया है लेकिन वे अपने नागरिकों के आंदोलन को रोकने में सफल नहीं हो पाई हैं और इन दोनों देशों में जनता का शांतिपूर्ण विरोध अब भी जारी है। (HN)