इज़राइली सेना में संकट
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पार्सटुडे – ज़ायोनी शासन की सेना के आधिकारिक सूत्रों ने कई मोर्चों पर चल रहे थकाऊ युद्ध के बीच इस सेना के वित्तीय संकट के बारे में चेतावनी दी है।
(last modified 2026-09-22T12:29:07+00:00 )
Sep २२, २०२६ १७:५६ Asia/Kolkata
  • इज़राइली सेना में संकट

पार्सटुडे – ज़ायोनी शासन की सेना के आधिकारिक सूत्रों ने कई मोर्चों पर चल रहे थकाऊ युद्ध के बीच इस सेना के वित्तीय संकट के बारे में चेतावनी दी है।

पार्सटुडे की रिपोर्ट के अनुसार ज़ायोनी शासन के सैन्य रेडियो ने बताया कि जब इज़राइल के सैन्य अभियान कई मोर्चों पर जारी हैं तो सेना रक्षा बजट के अंतर का अनुमान लगभग 25 अरब शेकेल, यानी करीब 8.2 अरब डॉलर लगा रही है। इस संबंध में ज़ायोनी शासन के सैन्य रेडियो के संवाददाता दोरोन कादोश ने घोषणा की कि सेना ने राजनीतिक नेतृत्व को सूचित किया है कि बजट में अरबों शेकेल जोड़े बिना वह तीन मोर्चों पर सुरक्षा बनाए नहीं रख सकेगी। साथ ही गाजा पट्टी, वेस्ट बैंक और लेबनान में तैनाती तथा इन मोर्चों पर निरंतर अभियान चलाना बहुत महंगा है और इन क्षेत्रों में सैन्य उपस्थिति बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण बजट की आवश्यकता है जो केवल युद्ध के मैदान में बलों को बनाए रखने से कहीं अधिक है।

 

ज़ायोनी शासन के सैन्य संस्थान का बजट बढ़ाने का दबाव कैबिनेट के बजट पर दबाव को तेज कर रहा है, घरेलू कर्ज बढ़ा रहा है और इस शासन के श्रम बाजार में कई चिंताएँ पैदा कर रहा है। अगस्त 2026 में ज़ायोनी शासन की सेना के चीफ ऑफ स्टाफ एयाल ज़मीर ने चेतावनी दी थी कि सेना कई मोर्चों पर युद्ध के साथ-साथ बजट के लिए भी लड़ रही है और अपनी परिचालन क्षमता बनाए रखने के लिए उसे कई दबावों और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

 

ज़ायोनी शासन की सेना के वर्तमान वित्तीय और बजटीय संकट को केवल इस शासन के युद्ध मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के बीच एक लेखा-जोखा विवाद नहीं माना जा सकता। यह संकट वास्तव में सैन्यवादी नीति और कई मोर्चों पर युद्धों के दायरे के लगातार विस्तार की भारी लागतों का सीधा प्रतिबिंब है। जिस सेना ने पिछले वर्षों में तकनीकी श्रेष्ठता, वायु शक्ति, मिसाइल रक्षा प्रणालियों और अमेरिका के व्यापक समर्थन पर निर्भरता दिखाई थी, वह अब ऐसी वास्तविकता का सामना कर रही है जिसमें अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया गया रक्षा बजट भी उसकी बढ़ती जरूरतों को पूरा नहीं कर सका। 2026 का रक्षा बजट अभूतपूर्व 143 अरब शेकेल, यानी करीब 45.8 अरब डॉलर, तक पहुँच गया और इसके बावजूद सेना अभी भी अतिरिक्त संसाधनों की माँग कर रही है।

 

इस स्थिति की मुख्य जड़ कई मोर्चों पर युद्ध और सैन्य अभियानों की निरंतरता है। गाजा का युद्ध, लेबनान में संघर्ष, वेस्ट बैंक में अभियान, ईरान के साथ युद्ध और यमन तथा अन्य क्षेत्रों में हमलों और सैन्य अभियानों ने ऐसी लागतें पैदा की हैं जिनकी प्रकृति एक अल्पकालिक अभियान से अलग है। थकाऊ युद्ध का अर्थ है गोला-बारूद, इंटरसेप्टर मिसाइलों, स्पेयर पार्ट्स, ईंधन, उपकरणों, रखरखाव और मरम्मत की लागत, रिजर्व बलों को भुगतान और क्षतिग्रस्त उपकरणों के प्रतिस्थापन की निरंतर खपत। इसलिए जब सैन्य अभियान नहीं रुकता तो बजट बढ़ाना भी जल्दी ही चालू खर्चों में समा जाता है। इज़राइली सूत्रों ने भी जोर दिया है कि गाजा युद्ध शुरू होने के बाद से सैन्य खर्च तेजी से बढ़े हैं और सेना एक साथ बलों का विस्तार कर रही है तथा युद्धों के दौरान क्षतिग्रस्त हुई क्षमताओं का पुनर्निर्माण कर रही है।

 

वर्तमान विवाद के आयाम तब और स्पष्ट हो जाते हैं जब हम जानते हैं कि युद्ध मंत्रालय ने एक समय 40 अरब शेकेल अतिरिक्त बजट की माँग की थी, जबकि जुलाई 2026 में सेना को तत्काल 15 अरब शेकेल और हस्तांतरित करने का समझौता हुआ। ये आँकड़े दिखाते हैं कि उपलब्ध संसाधनों और सेना की घोषित जरूरतों के बीच का अंतर बहुत व्यापक है। यहाँ तक कि इस शासन के हथियार उद्योग ने भी संसाधनों के आवंटन में देरी के परिणामों के बारे में चेतावनी दी है और रिपोर्टों के अनुसार यदि सरकारी ऑर्डर जारी नहीं रहे तो गोला-बारूद की कुछ उत्पादन लाइनें बंद होने के खतरे का सामना कर रही हैं। साथ ही सेना ने रिजर्व बलों की सेवा अवधि कम करने और कुछ क्षतिग्रस्त उपकरणों की मरम्मत रोकने की संभावना की बात कही है।

 

यह स्थिति एक महत्वपूर्ण विरोधाभास भी उजागर करती है। ज़ायोनी शासन अपनी प्रतिरोधक क्षमता और सैन्य श्रेष्ठता बनाए रखने के लिए रक्षा खर्च बढ़ाने को मजबूर है लेकिन यही बढ़ता खर्च सार्वजनिक बजट, बजट घाटे और अर्थव्यवस्था पर अधिक दबाव डालता है। 2026 में अभूतपूर्व सैन्य बजट आवंटित करने के बावजूद इस शासन को युद्ध खर्चों को पूरा करने के लिए अधिक संसाधन आवंटित करने और सैन्य खर्चों तथा अन्य आर्थिक और सामाजिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसलिए, मामला केवल पैसे की कमी नहीं है, बल्कि लंबे और समवर्ती युद्धों को पूरा करने की आर्थिक क्षमता की सीमा है।

 

सेना और कैबिनेट के बीच विवाद भी इसी बिंदु से उत्पन्न होता है। सैन्य कमांडर तर्क देते हैं कि संसाधनों में कमी या उनकी आपूर्ति में देरी सीधे परिचालन तैयारी को खतरे में डालती है जबकि वित्त मंत्रालय और राजनीतिक ढाँचे के कुछ हिस्से सैन्य खर्चों में निरंतर वृद्धि के परिणामों को लेकर चिंतित हैं। सेना के चीफ ऑफ स्टाफ एयाल ज़मीर ने भी अगस्त में बजट के लिए लड़ाई की बात कही थी और चेतावनी दी थी कि वित्तीय स्थिति सेना की तैयारी को प्रभावित कर सकती है। परिणामस्वरूप युद्ध सैन्य मैदान से इस शासन के राजनीतिक और आर्थिक ढाँचे के भीतर तक खिंच गया है।

 

इस संकट का अधिक महत्वपूर्ण परिणाम ज़ायोनी शासन की सेना के रणनीतिक लचीलेपन में कमी है। जिस सेना को नए हथियारों की खरीद, मौजूदा उपकरणों की मरम्मत, रिजर्व बलों के खर्चों का भुगतान और गोला-बारूद तथा इंटरसेप्टर मिसाइलों की आपूर्ति के बीच प्राथमिकता तय करनी पड़े वह लंबे युद्ध या मोर्चों के समवर्ती विस्तार के सामने अधिक सीमाओं का सामना करेगी। नए विमानों और हेलीकॉप्टरों की खरीद में संभावित देरी और गोला-बारूद की उत्पादन लाइनों के बंद होने की चेतावनी इसी बढ़ते दबाव के संकेत हैं।

 

वास्तव में ज़ायोनी शासन की सेना के बजट संकट को लगातार चलने वाले युद्धों के संरचनात्मक परिणामों में से एक माना जाना चाहिए। जब कोई शासन अपनी सुरक्षा को कई मोर्चों पर सैन्य अभियानों की निरंतरता पर आधारित करता है, तो युद्ध की लागतें मौसमी नहीं रहतीं बल्कि स्थायी खर्चों में बदल जाती हैं। ऐसी स्थितियों में अमेरिका का हथियार समर्थन भी युद्ध की सभी मानवीय, रसद और वित्तीय लागतों को समाप्त नहीं कर सकता। वर्तमान संकट दिखाता है कि थकाऊ युद्धों की निरंतरता ने न केवल सैन्य क्षमता बल्कि ज़ायोनी शासन की आर्थिक क्षमता और राजनीतिक एकजुटता को भी दबाव में डाल दिया है, एक ऐसा दबाव जो कई मोर्चों पर अभियानों के जारी रहने पर सैन्य जरूरतों और उनके वास्तविक वित्तपोषण की क्षमता के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है। mm