फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद की शिखर बैठक
बहरैन में मंगलवार को फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद की शिखर बैठक हुई। यह इस परिषद की 37 वीं शिखर बैठक है। अपने नाकाम ढांचे के साथ परिषद की यह बैठक एसे समय हुई कि जब उसके सामने अनेक चुनौतियां हैं।
बैठक में जिन विषयों पर बात हुई उनमें एक विषय यह भी था कि विघटन की कगार पर पहुंच चुकी इस परिषद को नए ढांचे का रूप किस तरह दिया जा सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि एक विफल संस्था के खंडहर पर नई संस्था की स्थापना करना इस नई संस्था की भी विफलता का कारण बनेगा। वह सभी कारक जिनके चलते यह परिषद विफल संस्था बनकर रह गई फ़ार्स खाड़ी अरब संघ के नाम से बनाई जाने वाली नई संस्था में भी मौजूद हैं। इस तरह फ़ार्स खाड़ी अरब संघ की विफलता का अनुमान इसके गठन से पहले ही लगाया जा सकता है।
बहरैन की राजधानी मनामा में हो रही इस बैठक के संबंध में एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि इसमें ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे भी शामिल हुईं। इससे यह पता चलता है कि फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के स्थान पर जो नई संस्था बनेगी वह भी इसी परिषद की तरह विश्व साम्राज्यवाद के गहरे प्रभाव में रहेगी। कहा जाता है कि फ़ार्स खाड़ी के अरब देश व्यवहारिक रूप से विदेशी सैनिक छावनियों के मेज़बान हैं। इन देशों की रक्षा व विदेश नीति पश्चिमी सरकारों के प्रभाव में रहती हैं। इस बीच सऊदी अरब की कोशिश यह होती है कि वह फ़ार्स खाड़ी सहयोग परिषद के अन्य देशों पर अपनी मर्ज़ी थोपे। सऊदी अरब की सैनिक व आर्थिक नीतियों का दुष्प्रभाव अन्य देशों पर पड़ा है। सऊदी अरब ने तेल की क़ीमत गिराने के लिए जो क़दम उठाए उसका नुक़सान अन्य देशों को भी उठाना पड़ा। इस परिषद को इस समय गहरे आर्थिक संकट का सामना है अतः वह अब अपना प्रारूप बदलकर अपने लक्ष्यों के लिए काम करना चाहती है। हालांकि इस परिषद की नीतियों ने सीरिया, इराक़ और यमन में भी भारी संकट उत्पन्न कर दिया है।
सऊदी अरब की नीतियों का ओमान ने खुलकर विरोध किया और इस देश ने यह भी कहा कि परिषद को संघ का रूप देने की सऊदी अरब की कोशिश इसलिए है कि वह सदस्य देशों पर और ज़्यादा दबाव डा सके।