इराक़, मूसिल अभियान क्यों धीमा पड़ गया
इराक़ के राष्ट्रीय गठजोड़ के नेता सैय्यद अम्मार हकीम ने कहा है कि उनके पास ऐसे दस्तावेज़ हैं, जिनसे साबित होता है कि क्षेत्रीय देशों के सैन्य व ख़ुफ़िया एजेंसियों के अधिकारी देश में सक्रिय हैं। उन्होंने कहा कि मूसिल की आज़ादी के सैन्य अभियान में धीमी प्रगति के जहां कई अन्य कारण हो सकते हैं, वहीं विदेशी ख़ुफ़िया अधिकारियों की सक्रियता भी एक महत्वपूर्ण कारण है।
उल्लेखनीय है कि इराक़ी सेना और स्वयं सेवी बलों ने 17 अक्तूबर को दाइश के ख़िलाफ़ मूसिल अभियान शुरू किया था। शुरू के कुछ दिनों में इराक़ी सेना ने बहुत तेज़ी से प्रगति की और थोड़े ही समय में दाइश के क़ब्ज़े से कई महत्वपूर्ण इलाक़ों को आज़ाद करा लिया। इराक़ी सेना की इस प्रगति को देखते हुए, विशेषज्ञों का कहना था कि 2016 के अंत तक मूसिल दाइश के क़ब्ज़े से आज़ाद हो जाएगा और इराक़ में दाइश की पराजय हो जाएगी।
मूसिल अभियान की धीमी गति के लिए विदेशी शक्तियों का हस्तक्षेप, विशेष रूप से अमरीकी हस्तक्षेप को ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। अमरीका और उसके घटक दाइश के ख़िलाफ़ लड़ाई के बहाने, उसे हथियार और सैन्य उपकरण उपलब्ध करा रहे हैं।
अम्मार हकीम का कहना है कि आतंकवाद के समर्थन कुछ देशों के अधिकारी मूसिल और अन्य इलाक़ों में तकफ़ीरी आतंकवादियों को लड़ाई में गाइड कर रहे हैं। यहां यह सवाल उठता है कि अमरीका, तुर्की और सऊदी अरब जैसे देश क्यों इराक़ में दाइश का समर्थन कर रहे हैं और मूसिल की आज़ादी में रुकावटें पैदा कर रहे हैं।
इसका स्पष्ट जवाब यह है कि इराक़ में एक शक्तिशाली सरकार, तुर्की और सऊदी अरब जैसे देशों के हित में नहीं है। दूसरी ओर यह देश इराक़ में आतंकवादी गुटों के ख़िलाफ़, स्वयं सेवी बलों की भूमिका से भी भयभीत हैं। सीरिया में आतंकवाद के ख़िलाफ़ स्वयं सेवी बलों की भूमिका ने भी आतंकवाद का समर्थन करने वाले देशों के सपनों पर पानी फेर दिया है। इसलिए कहा जा सकता है कि मूसिल अभियान कुछ रुकावटों के कारण, धीमा पड़ सकता है, लेकिन इसे सफल होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती।