दाइश के ख़िलाफ़ वास्तव में कौन लड़ रहा है
तथाकथित दाइश विरोधी गठबंधन देशों के सेना प्रमुख, दाइश के सबसे बड़े समर्थक सऊदी अरब की राजधानी रियाज़ में सम्मेलन कर रहे हैं।
अपने गठन के बाद से पिछले 28 महीनों के दौरान इस गठबंधन ने दाइश के ख़िलाफ़ कोई सफलता हासिल नहीं की है, इसके बावजूद यह इस गठबंधन के सदस्य देश आतंकवाद के विरुद्ध आपसी सहयोग में वृद्धि के लिए यह सम्मेलन कर रहे हैं।
सितम्बर 2014 में 68 देशों ने अमरीका के नेतृत्व में दाइश विरोधी गठबंधन बनाया था। अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने सबसे पहले सीरिया और इराक़ में ख़ून की होली खेल रहे आतंकवादियों को अच्छे और बुरे में बांटा और दाइश को बुरा आतंकवादी गुट बताया और कहा कि इससे मुक़ाबला करने की ज़रूरत है। इसी के साथ कहा कि सीरिया में दाइश के अलावा अन्य आतंकवादी गुट बुरे आतंकवादी नहीं हैं और उनका समर्थन किया जाना चाहिए।
आतंकवाद की अपनी इसी परिभाषा के आधार पर अमरीका और उसके सहयोगी देशों ने आतंकवादी गुटों की भरपूर सहायता की और उन्हें हर प्रकार के हथियार उपलब्ध करवाए।
इराक़ में भी आतंकवादी गुट दाइश की कार्यवाहियों पर नज़र डालने से पता चलता है कि अमरीकी गठबंधन ने इस तकफ़ीरी आतंकवादी गुट के ख़िलाफ़ कोई प्रभावी सैन्य अभियान नहीं चलाया है, बल्कि कभी कभी इस गुट को हथियार पहुंचाए हैं और इसे ग़लती से उठाया गया क़दम बता दिया।
दूसरी ओर रूस, ईरान और सीरिया ने आतंकवादी गुटों विशेष रूप से दाइश के ख़िलाफ़ प्रभावी क़दम उठाए हैं और इस गुट को काफ़ी कमज़ोर कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमरीका, सऊदी अरब और इस्राईल दाइश की मदद बंद कर दें तो कुछ ही महीनों में यह तीनों देश मध्यपूर्व में आतंकवाद की बिसात समेट देंगे।