ट्रंप के फ़ैसले से किस – किस को हुई प्रसन्नता?
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अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान, ईरान का विषय हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण मुद्दे के रूप में पेश किया जाता रहा है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Feb ०६, २०१७ १५:५५ Asia/Kolkata
  • ट्रंप के फ़ैसले से किस – किस को हुई प्रसन्नता?

अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव प्रचार के दौरान, ईरान का विषय हमेशा से एक चुनौतीपूर्ण मुद्दे के रूप में पेश किया जाता रहा है।

चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप ने ओबामा प्रशासन पर ईरान के समाने न डटने और तेहरान के सामने झुकने तक का आरोप लगा दिया था जबकि हिलेरी क्लिंटन ने ईरान और विश्व की छह बड़ी शक्तियों के मध्य होने वाले परमाणु समझौते का का समर्थन करते हुए तेहरान से मुक़ाबले पर बल दिया था और उन्होंने ने ईरान को आतंकी गुट दाइश की श्रेणी में कर दिया था।

यह क्रम चुनाव में ट्रंप की विजय और वाइट हाऊस में उनके प्रविष्ट होने के बाद भी जारी है। अमरीका के नये राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तो चुनाव में रिपब्लिकंस से हटकर नीति अपनाई थी किन्तु उन्होंने पार्टी का समर्थन प्राप्त करने के लिए ईरान के विरुद्ध अपने हमले तेज़ कर दिया यहां कि जार्ज बुश के दौर का वह समय थी याद आ गया जब उन्होंने कहा था कि ईरान पर हमले सहित सारे विकल्प मेज़ पर हैं। यहां पर भी ट्रंप ने अपने पूर्वजों का अनुसरण करते हुए अमरीकी इतिहास को दोहरा दिया।

दूसरी ओर अमरीका के नये राष्ट्रपति के बयान से इस्राईल और सऊदी अरब जैसी ईरान विरोधी सरकारों के लिए प्रोपेगैंडे करने और प्रसन्न होने का अवसर मिल गया। सऊदी अरब के रक्षामंत्रालय के सलाहकार और यमन विरोधी सैन्य गठबंधन के प्रवक्ता अहमद असीरी ने कुछ महीने चुप रहने के बाद, कुछ दिन पहले ईरान विरोधी बयान देते हुए कहा कि उनका देश अमरीका के साथ रणनैतिक दृष्टि से पूर्ण रूप से समन्वित है और उसे आशा है कि जारी वर्ष के दौरान ईरान के विरुद्ध दबावों में और अधिक वृद्धि होगी।

अमरीका में चुनाव जीतने के बाद से डोनल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के हवाले से कड़ी नीतियां अपनाई यही कारण था कि रियाज़ के अधिकारी मध्यपूर्व के बारे में ट्रंप प्रशासन की नीतियों के स्पष्ट हो जाने तक पूरी तरह कान में तेल डाले बैठे रहे किन्तु जैसे ही वाशिंग्टन का ईरान विरोधी कार्यक्रम स्पष्ट हुआ, सऊदी अरब ने ईरानोफ़ोबिया की अपनी नीतियों को विस्तृत कर दिया।

इसी प्रकार ज़ायोनी शासन भी जो ओबामा प्रशासन के काल में ईरान के बारे में अमरीका की नीतियों से बहुत चिंतित था, ट्रंप के सत्ता में पहुंचने और ब्रिटेन में इस्राईल समर्थन के सत्ता में आने से बहुत अधिक आशान्वित हो गया है ताकि वह तेहरान के विरुद्ध मोर्चा गठित कर सके। इसी परिप्रक्ष्य में बहरैन की राजधानी मनामा में फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद की बैक्षठक की समाप्ति पर ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थ्रेसा मे के बयान ने तेल अवीव को इस मोर्चे के अस्तित्व में आने के प्रति अधिक आशान्वित कर दिया है।

थ्रेसा मे ने मनामा में आधिकारिक रूप से घोषणा की थी कि हम फ़ार्स की खाड़ी सहयोग परिषद में अपने घटकों के साथ एक रणनैतिक भागीदारी का प्रयास कर रहे हैं ताकि क्षेत्र में ईरान के गंभीर ख़तरों से मुक़ाबला किया जाए। ईरान सहित सात मुस्लिम बाहुल्य देशों के नागरिकों पर अमरीका में प्रवेश पर लगाए गये प्रतिबंध के आदेश पर लंदन की प्रतिक्रिया सामने न आने से भी पता चलता है कि तेहरान के विरुद्ध ब्रिटेन और अमरीका एक साथ हो चुके हैं।

लंदन की यात्रा से पहले इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामीन नेतिनयाहू ने जो बयान दिया था से पता चलता है कि तेहरान के विरुद्ध वाशिंग्टन, लंदन और तेल अवीव एकत्रित हो गये हैं। इस्राईली और सऊदी अधिकारियों को यह पता है कि ईरान पर सैन्य हमले की संभावना, ईरान की ओर से करारा जवाब दिए जाने के कारण शून्य है किन्तु वह इस बात से प्रसन्न हैं कि ईरान के विरुद्ध अमरीका के नेतृत्व में विश्व समुदाय और क्षेत्र के लोग फिर एकत्रित हो रहे हैं।

इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि ओबामा के काल में आर्थिक और सैन्य क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के बारे में विभिन्न प्रस्ताव तो पारित हुए किन्तु दोनों पक्षों के मध्य होने वाले परमाणु समझौते से किसी सीमा तक ईरान के विरुद्ध वैश्विक व्यवस्था के दबाव कम हुए थे किन्तु ट्रंप के सत्ता में पहुंचते ही सब कुछ बदल गया। इसीलिए कहा जा सकता है कि जब तक ईरान के विरुद्ध अमरीका और उसके कुछ घटकों के एक पक्षीय प्रतिबंधों, मीडिया और उनकी नीतियों के माध्यम से दबाव बढ़ता रहेगा, तब तक इस्राईल और सऊदी अरब को मध्यपूर्व में अपने अपराधों और आतंकियों की सहायता पर पर्दा डालने का अवसर मिलता रहेगा।

बहरहाल इस लक्ष्य के व्यवहारिक होने की स्थिति में ईरानोफ़ोबिया के अलावा फ़ार्स की खाड़ी के देशों के लिए अमरीका और ब्रिटेन के हथियारों की मंडी का रास्ता खुल जाएगा और क्षेत्र में तेल अवीव और रियाज़ की दृष्टिगत नीतियों से जनमत के ध्यान को हटाने के लिए मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।

यही कारण है कि अमरीका और ब्रिटेन के साथ इस्राईल के अतिरिक्त सऊदी अरब भी ईरान के विरुद्ध दबाव बढ़ाने के मोर्चे में शामिल हो गया है ताकि ईरान के मीज़ाइल परीक्षण को बहाना बनाकर तेहरान पर दबाव डाल सके। (AK)