ईरान के मिज़ाइलों पर इस्राईल मुर्दाबाद के नारे,
https://parstoday.ir/hi/news/west_asia-i37084-ईरान_के_मिज़ाइलों_पर_इस्राईल_मुर्दाबाद_के_नारे
सन 80 के दशक में सोवियत संघ के टूटने के बाद नैटो के तत्कालीन महासचिव जोज़फ़ ल्यून्स ने कहा था  पश्चिम को अब चाहिए कि नए शत्रु की खोज करे और उनके विचार में चरमपंथी इसलामी संगठन इस संबंध में सोवियत संघ का स्थान ले सकते हैं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Feb २३, २०१७ १४:३१ Asia/Kolkata
  • ईरान के मिज़ाइलों पर इस्राईल मुर्दाबाद के नारे,

सन 80 के दशक में सोवियत संघ के टूटने के बाद नैटो के तत्कालीन महासचिव जोज़फ़ ल्यून्स ने कहा था  पश्चिम को अब चाहिए कि नए शत्रु की खोज करे और उनके विचार में चरमपंथी इसलामी संगठन इस संबंध में सोवियत संघ का स्थान ले सकते हैं।

हालिया म्युनिख़ सुरक्षा सम्मेलन की ख़बरों को देखते हुए जोज़फ़ ल्युन्स की याद आ गई। इस लिए कि इस सम्मेलन में शामिल सभी देशों ने आपसी विवादों को एक किनारे रख दिया और एक शत्रु के ख़िलाफ़ लामबंद होते दिखाई दिए जिसे दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा कह दिय गया और वह शत्रु ईरान था, चीन, रूस या उत्तरी कोरिया नहीं।

इस्राईली मंत्री एविग्डर लेबरमैन को मुंह मांगी मुराद मिल गई उन्हें इस सम्मेलन में जितना समर्थन मिल गया उतना समर्थन उन्हें तेल अबीब में भी नहीं मिल सकता था। विशेष रूप से यह अरबों और तुर्की का समर्थन उल्लेखनीय रहा, अमरीका और यूरोपी से उन्हें समर्थन मिलना स्वाभाविक था। लेबरमैन ने अपना पूरा भाषण ईरान पर केन्द्रित रखा और उनके भाषण में ख़ूब तालियां बजीं।

अमरीका के रिपब्लिकन सिनेटर लिंडसे ग्राहम ने जो सिनेट की आर्म्ड फ़ोर्सेज़ कमेटी के सदस्य हैं म्युनिख़ सम्मेलन में कहा कि कांग्रेस ईरान पर नए प्रतिबंध लगाने के बारे में विचार कर रही है। यदि ईरान अपना रवैया नहीं बदलता है तो उस पर प्रतिबंध लगाए जाएंगे। हम अगर ग्राहम से सवाल करें कि वह ईरान के रवैये में क्या बदलाव देखना चाहते हैं तो वह तत्काल जवाब देंगे कि ईरान अपन मिज़ाइलों पर इस्राईल मुर्दाबाद का नारा लिखना बंद कर दे।

अगर इन मिसाइलों पर चीन मुर्दाबाद या रूस मुर्दाबाद लिखा होता तो कोई हरज नहीं था और ईरान को मिसाइल परीक्षण करने और सैन्य अभ्यास करने की पूरी इजाज़त होती, बल्कि उसे अमरीका से आधुनिक मिसाइल टेक्नालोजी भी मिलती, ईरान के यूरेनियम संवर्धन में भी तब कोई आपत्ति की बात न रहती। लेकिन अगर इस्राईल मुर्दाबाद का शब्द लिख दिया गया है तो फिर ईरान पर प्रतिबंध लगाना ज़रूरी हो गया है।

अरब और मुसलमान होने की हैसियत से अब हमारे लिए तो इस्राईल मुर्दाबाद का नारा कहीं भी लिखना प्रतिबंधित है यहां तक कि शाब्दिक तसल्ली के तौर पर भी हम एसा नहीं कर सकते। यदि हमने एसा किया तो प्रतिबंध और मौत हमारा मुक़द्दर होगी।

हमें तो यह आशा है कि अगली म्युनिख़ कान्फ़्रेन्स में सिनेटर ग्राहम, तुर्की, इस्राईल और सऊदी अरब के विदेश मंत्री आकर हमें यह भी बता देंगे कि हमारे बच्चों को स्कूलों में सुबह के तराने में कौन से नारे दोहराने हैं और यदि हमने एसा किया तो हमारे ऊपर हमला हो जाएगा।

ईरान तीस साल से अधिक समय से अमरीका मुर्दाबाद के नारे लगा रहा है और उसने अपने होटलों के प्रवेश द्वार पर अमरीकी ध्वज बिछ रखा है जिसे कुचलते हुए लोग होटलों में प्रवेश करते हैं। इस की तो अनुमति है और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता माना जाता है लेकिन यदि इस्राईल मुर्दाबाद का नारा यदि कोई लगाता है तो उसकी जान ख़तरे में पड़ जाएगी।

आख़िर में हम यह भी कहना चाहेंगे कि जब इस्राईल मुर्दाबाद के नारे पर ईरान के ख़िलाफ़ प्रतिबंध लगाने और समुद्री बेड़ों को हरकत में लाने की बात होने लगी है तो ईरान की मेज़बानी में होने वाली फ़िलिस्तीनी कान्फ़्रेन्स पर अमरीका और ट्रम्प प्रशासन की क्या प्रतिक्रिया होगी जिसमें 80 देशों ने भाग लिया और अवैध रूप से अधिकृत फ़िलिस्तीनी धरती की आज़ादी की मांग की और इस्राईल को ध्वस्त कर दिए जाने पर बल दिया।

जो अमरीकी, इस्राईली और अरब ईरान के विरुद्ध यह प्रोपैगंड अभियान चला रहे हैं वह वास्तव में ईरान की बहुत बड़ी सेवा कर रहे हैं क्योंकि इस तरह अरबों और मुसलमानों के बीच ईरान की लोकप्रियता बढ़ेगी जबकि ईरान से शत्रुता बरतने वाले शासनों के विरुद्ध नफ़रत पैदा होगी।

अमरीका ने युद्ध में 5 ट्रिलियन डालर और 5 हज़ार सैनिक गंवा दिए और उसके 30 हज़ार सैनिक घायल हुए। यदि अमरीका और इस्राईल ने ईरान के विरुद्ध युद्ध छेड़ा जो इराक़ से दुगना क्षेत्रफल रखता है तो कुछ पता नहीं कि उन्हें कितना नुक़सान उठाना पड़ेगा, क्या फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों की दौलत इस नुक़सान की भरपाई की भरपाई कर पाएगी? हमें तो नहीं लगता कि भरपाई हो पाएगी चाहे सऊदी अरब इसके लिए साबेक से लेकर आरामको तक सारी तेल कंपनियां, आयल फ़ील्ड और खदानें भी बेच दें।

 

अब्दुल बारी अतवान

लेखक अरब दुनिया के प्रख्यात लेखक और टीकाकार हैं