हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन, शीत युद्ध से व्यापक टकराव तक
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हिज़्बुल्लाह लेबनान और ज़ायोनी शासन के बीच युद्ध विराम के काल में दोनों ओर शीत युद्ध की स्थिति है और सुरक्षा की व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। यह आशंका बनी हुई है कि किसी भी क्षण आपसी टकराव एक बड़े युद्ध का रूप धारण कर ले।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Feb २८, २०१७ १७:२४ Asia/Kolkata
  • हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन, शीत युद्ध से व्यापक टकराव तक

हिज़्बुल्लाह लेबनान और ज़ायोनी शासन के बीच युद्ध विराम के काल में दोनों ओर शीत युद्ध की स्थिति है और सुरक्षा की व्यापक तैयारियां की जा रही हैं। यह आशंका बनी हुई है कि किसी भी क्षण आपसी टकराव एक बड़े युद्ध का रूप धारण कर ले।

फ़िलिस्तीनी व स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ सेंटर ने अपनी एक रिपोर्ट में हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन के बीच शीत युद्ध की समीक्षा करते लिखा है कि हिज़्बुल्लाह और ज़ायोनी शासन के बीच दुशमनी एतिहासिक है और आस्था संबंधी है जिसकी जड़े बहुत गहरी हैं और दोनों में संधि कभी भी संभव नहीं है। दोनों के बीच अब तक कई युद्ध हो चुके हैं। आख़िरी जंग वर्ष 2006 में हुई थी। इस युद्ध में ज़ायोनी शासन इस विश्वास के साथ उतरा था कि उसकी विजय निश्चित है। ज़ायोनी शासन और उसके समर्थकों को यक़ीन था कि हिज़्बुल्लाह ने चाहे जितनी तैयारी कर रखी है इस्राईल के व्यापक हमलों के सामने वह कुछ ही दिन टिक पाएगा। हमले की योजना पहले से ही तैयार थी और ज़ायोनी शासन उचित अवसर की  प्रतीक्षा में था कि बड़े पैमाने पर हमला करके हिज़्बु्ल्लाह को ख़त्म कर दे। हिज़्बुल्लाह ने स्थिति को भलीभांति परख कर पहल कर दी और एक सैनिक आप्रेशन करके इस्राईली सैनिकों को बंधक बना लिया। इसके बाद इस्राईल का युद्ध शुरू हो गया जो 33 दिन तक चला और आख़िरकार इस्राईल को युद्ध रोकना पड़ा क्योंकि उसे अब पता चल चुका था कि हि़ज़्बुल्लाह को ख़त्म करना संभव नहीं है। इस युद्ध में इस्राईल ने आधुनिक अमरीकी युद्धक विमानों का प्रयोग करके लेबनान में बड़े पैमाने पर जनसंहार किया और इमारतों को नुक़सान पहुंचाया लेकिन वह हिज़्बुल्लाह के जियालों के जवाबी हमलों से कराहने भी लगा। नतीजा यह हुआ कि इस्राईल ने अपनी सैनिक शक्ति का जो हौवा खड़ा कर रखा था वह समाप्त हो गया।

तत्कालीन ज़ायोनी प्रधानमंत्री एहूद ओलमर्ट ने कहा था कि इस युद्ध के दो प्रमुख लक्ष्य हैं, एक है इस्राईली सैनिकों को वापस लाना और दूसरे हिज़्बु्ल्लाह को निरस्त्र करना। इस्राईल ने कहा था कि वह हिज़्बुल्लाह को इतना कमज़ोर कर देगा कि हिज़्बुल्लाह क्षेत्र की सामरिक व राजनैतिक शक्ति की हैसियत खो देगा। वैसे यह इ्स्राईल के बहुत पुराने लक्ष्य हैं जिनके साथ कुछ नए लक्ष्य भी जोड़ दिए गए थे। लेकिन इस्राईल का एक भी लक्ष्य पूरा नहीं हो पाया।

हिज़्बुल्लाह और इस्राईल के बीच शीत युद्ध

 

पहले चरण में तो शायद एसा लगे कि दोनों के बीच शीत युद्ध की बात हिज़्बुल्लाह या उसके किसी समर्थक नेता की ओर से कही गई होगी लेकिन सच्चाई यह है कि सबसे पहले यह बात ज़ायोनी सेना के उत्तरी डिविजन के कमांडर गैडी आइज़नकोट ने कही थी। उन्होंने उत्तरी भागों के दौरे के अवसर पर कहा था कि हिज़्बुल्लाह की गतिविधियां यूरोप में शीतयुद्ध के ज़माने की याद दिलाती हैं।

वर्ष 2006 के युद्ध से पहले हिज़्बुल्लाह लेबनान के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने अपने एक बयान में ज़ायोनी अधिकारियों को धमकी दी थी कि यदि युद्ध शुरू हुआ तो इस्राईल का कोई कोना भी सुरक्षित नहीं रहेगा। इसके जवाब में ज़ायोनी शासन के तत्कालीन परिवहन मंत्री ने कहा था कि हम लेबनान के पाषाण काल में पहुंचा देंगे।

वर्ष 2006 के युद्ध का जो परिणाम निकला उसके कई असर देखने में आए। सबसे बड़ा असर यह हुआ कि उसके बाद से अब तक दोनों पक्षों के बीच युद्ध नहीं हुआ। इसके कई कारण हैं।

एक कारण यह है कि ग़ज़्जा युद्ध में ज़ायोनी सेना की कमज़ोरी बार बार सामने आई है जिसके कारण वह लेबनान के विरुद्ध युद्ध छेड़ने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। आख़िरी गज़्ज़ा युद्ध 51 दिन चला। यह भी ज़ायोनी शासन के लिए बड़े घाटे का सौदा साबित हुआ।

दूसरा कारण यह है कि ज़ायोनी शासन ने हिज़्बुल्लाह को जब सीरिया के पटल पर उतरते देखा तो उसे बड़ी ख़ुशी हुई कि इसी लड़ाई में हि़ज्बुल्लाह बहुत कमज़ोर हो जाएगा।

तीसरा कारण यह है कि हिज़्बुल्लाह ने वर्तमान काल खंड का प्रयोग करते हुए जो न युद्ध और न ही पूर्ण शांति का ज़माना है, अपनी रक्षा क्षमता में व्यापक वृद्धि कर ली है। उसके अनुभव और शक्ति में लगातार वृद्धि हो रही है। यही कारण है कि हिज़्बुल्लाह वर्तमान परिस्थितियों में जब एक मोर्चे पर तकफ़ीरियों से लड़ रहा है तो इस्राईल के विरुद्ध दूसरा मोर्चा नहीं खोलना चाहता।

चौथा कारण यह है कि दोनों पक्ष यह जानते हैं कि लड़ाई हुई तो नुक़सान बहुत अधिक है और युद्ध कब समाप्त होगा यह किसी को पता नहीं है इस लिए किसी भी तरफ़ से युद्ध की शुरुआत नहीं हो रही है।

वैसे कभी कभी धमकियां सुनाई देती हैं जिन्हें मनोवैज्ञानिक युद्ध का भाग माना जा सकता है।

इस्राईल के समीकरण उलट गए

 

इस्राईल को इंटेलीजेन्स अनुमानों के स्तर पर बार बार नाकामी का सामना करना पड़ रहा है। ज़ायोनी युद्ध मंत्री एहूद बाराक ने कहा था कि बश्शार असद की सरकार कुछ ही हफ़्तों में गिर जाएगी। यह बात उन्होंने इस्राईली इंटेलीजेन्स की जानकारियों के आधार पर कही थी लेकिन एसा नहीं हुआ। छह साल गुज़र जाने के बाद आज बश्शार असद और उनके समर्थकों की स्थिति पहले से अधिक मज़बूत हो चुकी है। इसी तरह हि़ज्बुल्लाह की शक्ति और रणकौशल के बारे में इस्राईली इंटेलीजेन्स के अनुमान बार बार ग़लत साबित हुए। वह सीरिया की लड़ाई में हिज्बुल्लाह के शामिल होने के परिणामों का भी सही अनुमान नहीं लगा सके।

यही नहीं सीरिया की लड़ाई में रूस की शामिल होने के परिणामों का अनुमान भी ज़ायोनी शासन नहीं लगा सका क्योंकि इस्राईली अधिकारियों को इस्लामी गणतंत्र ईरान और रूस के बीच पाए जाने वाले समन्वय के स्तर का सही अनुमान नहीं था।

वैकल्पिक सुरक्षा युद्ध

 

इन परिस्थितियों में जब हिज़्बु्ल्लाह और ज़ायोनी शासन के बीच व्यापक युद्ध की संभावना कम हो गई है तो दोनों के बीच सुरक्षा और इंटैलीजेन्स लड़ाई तेज़ हो गई है। हिज़्बु्ल्लाह के बहुत बड़े और कामयाब कमांडर एमाद मुग़निया को 12 फ़रवरी 2008 को ज़ायोनी शासन के एजेंटों ने शहीद कर दिया। हिज़्बु्ल्लाह के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने क़सम खाई कि मुग़निया के ख़ून का बदला इस्राईल से ज़रूर लिया जाएगा। इसी संबंध में थाईलैंड, जार्जिया और बुल्ग़ारिया सहित कुछ देशों में इस्राईलियों पर हमले हुए। इस्राईल ने इन हमलों को हिज़्बुल्लाह की ओर से लिया जाने वाला इंतेक़ाम माना। ज़ायोनी शासन ने जनवरी वर्ष 2013 में बैरूत में हिज़्बुल्लाह के वरिष्ठ कमांडर हेसान अल्लक़ीस को शहीद कर दिया। ज़ायोनी शासन का कहना था कि वह इस्राईल की वायु सीमा में अय्यूब नाम का ड्रोन विमान उड़ाने की योजना के ज़िम्मेदार था।

हिज़्बुल्लाह की मिसाइल ताक़त ध्वस्त करने के लिए इस्राईली रणनीति

 

इस्राईल ने हि़ज़्बुल्लाह की मिसाइल शक्ति को तबाह करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण रणनीतियां बनाई हैं। एक रणनीति का एलान ज़ायोनी शासन के पूर्व चीफ़ आफ़ आर्मी स्टाफ़ मूशे यअलून की ओर से किया गया। यह रणनीति हिज़्बुल्लाह को लेबनान के भीतरी विवादों में उलझाने की थी ताकि हिज़्बु्ल्लाह के मिसाइल मौजूद होते हुए भी बेकार होकर रह जाएं।

दूसरी रणनीति गैडी आइज़नकोट की है। उनका कहना है कि युद्ध शुरू किया जाए और हिज़्बुल्लाह के मिसाइल हमलों के जवाब में केवल दक्षिणी लेबनान नहीं बल्कि पूरे लेबनान को बड़े पैमाने पर ध्वस्त कर दिया जाए। लेकिन जब सैयद हसन नसरुल्लाह ने वर्ष 2009 और वर्ष 2010 के अपने भाषणों में यह कह दिया कि लेबनान की एक इमारात ध्वस्त होने के स्थिति में इस्राईल की कई इमारतें ध्वस्त करेंगे तो आइज़नकोट की रणनीति पर सवाल उठने लगे। इसलिए कि इस्राईल को मिलने वाली रिपोर्टों से स्पष्ट हो चुका था कि हिज़्बुल्लाह के पास कम से कम 40 हज़ार मिज़ाइल हैं। इनमें ज़िलज़ाल तथा एम600 जैसे मिज़ाइल भी हैं जो बहुत बड़े पैमाने पर तबाही मचाते हैं। यह मिज़ाइल तेल अबीब और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं।

इसके बाद आइज़नकोट ने बयान दिया कि हिज़्बुल्लाह और इस्राईल के बीच शीत युद्ध जैसी स्थित है अर्थात दोनों पक्ष अपनी अपनी शक्ति बढ़ रहे हैं।

 हिज़्बुल्लाह के वह हथियार जो समीकरणों को बदल देने में सक्षम हैं

जब हिज़्बुल्लाह के संघर्षकर्ता सीरिया की लड़ाई में उतर गए तो ज़ायोनी शासन को यह चिंता सताने लगी कि हिज़्बुल्लाह और सीरिया के बीच रिश्तों की मज़बूती की स्थिति में हिज़्बुल्लाह को अत्याधुनिक हथियार सीरिया से मिल जाएंगे। इन हथियारों में से एक याख़ोन्ट मिसाइल है जिसकी मारक दूरी 300 किलोमीटर है। यह मिज़ाइल 750 किलोमीटर प्रति सेकेंट की रफ़तार से अपने लक्ष्य की ओर झपटता है अतः उसे राडार से देखा नहीं जा सकता। इस मिसाइल पर 200 किलोग्राम के वारहेड लगते हैं। यह मिज़ाइल समुद्री जहाज़ को ध्वस्त कर देने में सक्षम है। एक और मिसाइल फ़ातेह 110 है जो ईरान का एंटीसेप्टर मिज़ाइल है। इसकी मारक दूरी 300 किलोमीटर है और भारी विध्वंसक क्षमता रखता है। वैसे इस्रराईल की बहुत कोशिश है कि यह हथियार हिज़्बुल्लाह को न मिलने पाएं। इस्राईल को यदि शक हो जाता है तो सीरिया से लेबनान जाने वाली किसी भी खेप पर हमला कर देता है लेकिन इस्राईली विशेषज्ञों का कहना है कि यह हथियार हिज़्बुल्लाह तक पहुंच चुके हैं और कड़ी निगरानी रखने के बावजूद इस्राईल यह हथियार लेबनान जाने से नहीं रोक सका।

इस्राईल की ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार हिज़्बुल्लाह के पास मिसाइलों की संख्या अब एक लाख से डेढ़ लाख तक पहुंच चुकी है।

 

एक और विषय जिसने समीकरणों को बदल दिया यह था कि जब इस्राईल ने 24 फ़रवरी 2014 को सीरिया और लेबनान की सीमा के निकट हिज़्बुल्लाह के एक ठिकाने पर हमला किया तो इसके जवाब में हिज़्बुल्लाहने जबलुश्शैख़ में इस्राईली सेना के ठिकानों पर मिसाइल फ़ायर कर दिया। एक महीने बाद हिज़्बुल्लाह ने एक बम धमाका शबआ के इलाक़े में कर दिया। इस्राईल ने जब लेबनान के भीतर एक धमाका करके हिज़्बुल्लाह के एक अधिकारी की हत्या की तो हिज़्बुल्लाह ने शबआ में धमाका करके इस्राईली सैनिकों के कारवां को निशाना बनाया। यानी हर हमले का जवाब उसी हमले के अंदाज़ में दिया गया।

क्या हैं वर्तमान समीकरण 

 

टीकाकारों का मानना है कि दोनों पक्षों में से यदि किसी भी पक्ष ने दूसरे की शक्ति का अनुमान लगाने में कोई ग़लती की तो बहुत बड़ी लड़ाई शुरू हो जाएगी। इस्राईल ने हाल ही में एक सैनिक सभ्यास किया जो लेबनान के साथ यु्द्ध को दृष्टिगत रखकर किया गया। इस अभ्यास में इस्राईल की यह कोशिश थी कि लेबनान पर हमले का अभ्यास करने के साथ ही अपने नागरिकों को बचाने के लिए प्रभावी उपायों का भी परीक्षण करे। इस समय हिज़्बुल्लाह और इस्राईल के बीच ख़फ़िया युद्ध जारी है। इस्राईल अपनी इंटेलीजेन्स की मदद से हिज़्बुल्लाह के सैनिकों, शस्त्रागारों और तैयारियों की जानकारी जुटाने की चेष्टा में है। उनकी कोशिश है कि हिज़्बुल्लाह के वरिष्ठ कमांडरों और नेताओं के एकत्रित होने के ठिकानों की जानकारी प्राप्त कर लें। लेकिन इस्राईल को वर्ष 2006 की इंटेलीजेन्स विफलताएं याद हैं। हिज़्बुल्लाह जान बूझ कर कुछ गतिविधियां इस्राईली इंटेलीजेन्स को गुमराह करने के लिए भी करता है।

ज़ायोनी शासन की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह अन्य देशों से लाकर इ्स्राईल में बसाए गए यहूदियों का विश्वास खो चुका है। वर्ष 2006 की लड़ाई से साबित हो गया कि ज़ायोनी शासन के पास इन यहूदियों की सुरक्षा की ताक़त नहीं है। इसी लिए लगभग डेढ़ लाख यहूदी इस्राईल से वापस अपने देशों की ओर लौट चुके हैं। हालांकि वर्ष 2006 की लड़ाई में हिज़्बुल्लाह ने जो मिसाइल हमले किए थे वह उसकी आज की ताक़त की तुलना में काफ़ी सीमित थे। आज के समीकरणों से इस्राईल में रहने वालों में गहरा भय व्याप्त है।

इस्राईल में बार बार हिज़्बुल्लाह की मिसाइल ताक़त की  रिपोर्टों प्रकाशित हो रही हैं और हर नई रिपोर्ट में हिज़्बुल्लाह की ताक़त में बहुत अधिक वृद्धि की बात कही जाती है।