बहरैन के 40 क्षेत्रों में 112 शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए
14 फरवरी वर्ष 2011 से बहरैन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन व आपत्ति जारी है।
बहरैन से प्राप्त समाचार इस बात के सूचक हैं कि आले खलीफा सरकार ने इस देश की जनता के दमन में वृद्धि कर दी है। बहरैन में मानवाधिकार केन्द्र की रिपोर्ट के अनुसार पिछले कई दिनों के बहरैन के 40 क्षेत्रों में 112 शांतिपूर्ण प्रदर्शन हुए हैं।
इस केन्द्र की रिपोर्ट में आया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के महत्वपूर्ण भाग का आले खलीफ़ा सरकार के सुरक्षा बलों ने दमन कर दिया और बहरैन के दसियों नागरिकों को गिरफ्तार कर लिया जबकि कुछ सुरक्षा बलों की गोलियों से घायल भी हुए हैं।
14 फरवरी वर्ष 2011 से बहरैन में शांतिपूर्ण प्रदर्शन व आपत्ति जारी है। बहरैनी जनता की मुख्य मांग यह की है कि तानाशाही सरकार के स्थान पर लोकतांत्रिक सरकार स्थापित हो, भेदभाव समाप्त किया जाये, राजनीतिक सुधार हो, मानवाधिकार और न्याय का ध्यान रखा जाये, आज़ादी हो और पश्चिम पर निर्भरता समाप्त की जाये।
बहरैन के लोग इस देश में लोकतांत्रिक सरकार न होने से अप्रसन्न हैं और भेदभाव से दुःखी हैं। बहरैन की आले खलीफा सरकार अपने अपराधों में वृद्धि करके इस देश की जनता की आवाज़ को दबा देने की चेष्टा में है परंतु बहरैन की तानाशाही सरकार की कार्यवाहियों से इस देश का शांतिपूर्ण जनांदोलन न केवल समाप्त नहीं हुआ है बल्कि उसमें वृद्धि भी हो गयी है।
बहरैनी जनता को जिन समस्याओं का सामना है उनमें से एक भेदभाव है और उसकी बुनियाद तानाशाही और लोगों के मध्य मतभेद व फूट पर रखी गयी है।
सत्ता और सम्पत्ति का एक विशेष परिवार के पास सीमित होना वह चीज़ है जो 14 फरवरी 2011 के जनांदोलन का कारण बनी। बहरैनी जनता समस्त सीमाओं और हर प्रकार के दमन के बावजूद अब भी अपनी मांग पर डटी हुई है और कभी भी वह अपनी मांग से पीछे नहीं हटी है।
देश के भीतर बहरैनी सरकार की वैधता का कम हो जाना और लोगों तथा सरकार के मध्य दराड़ का उत्पन्न होना इस बात का कारण बना है कि बहरैन की तानाशाही सरकार अपने अस्तित्व के बाक़ी रहने को अमेरिका और सऊदी अरब के समर्थन में देख रही है जबकि वह मिस्र के पूर्व तानाशाह हुस्नी मुबारक जैसे शासकों के भविष्य को भूल गयी है जो अपने देश की जनता के बजाये बाहरी शक्तियों पर भरोसा करते थे। MM