“ग्रेटर मिडिल ईस्ट” का सपना जो साकार न हो सका
“ग्रेटर मीडिल ईस्ट” की कल्पना पहली बार 12 दिसंबर 2002 को कोलिन पॅावेल की ओर से पेश की गयी जिसका उद्देश्य राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में सुधार के लिए अरब देशों की सहायता करना था।
यद्यपि अरब देश इस योजना के कट्टर विरोधी थे और यूरोपीय देश भी इस योजना पर चिंता प्रकट कर चुके थे लेकिन नाइन इलेवन के बाद अमरीका ने इस योजना पर गंभीरता से अमल करना आरंभ कर दिया।
इसी योजना के बारे में यूरोपीय संघ और अमरीका के बीच पाए जाने वाले मतभेदों से पता चलता है कि यह दोनों ही इस क्षेत्र में अपने - अपने राजनैतिक हितों को साधने की चेष्टा में हैं।
दूसरी ओर अमरीका की ओर से इस योजना को व्यवहारिक बनाने के लिए अपनायी गयी शैली की वजह से जिसमें क्षेत्र के स्थानीय निवासियों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए एकपक्षीय सैन्य कार्यवाही का सहारा लिया जा रहा है, क्षेत्र में लोकतांत्रिक प्रक्रिया का आरंभ निर्धारित समय के लिए विलंब का शिकार हो गया।
“इस्लामी मध्यपूर्व” शब्दावली का प्रयोग पहली बार 2006 में लेबनान के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हिज़्बुल्लाह के विरुद्ध 33 दिवसीय युद्ध में इस्राईल की लज्जाजनक पराजय के बाद किया गया।
इस शब्दावली का प्रयोग वास्तव में तत्कालीन अमरीकी विदेशमंत्री की ओर से “न्यू मिडिलईस्ट” के मुक़ाबले में किया गया। हमने इस लेख में यह समीक्षा करने की कोशिश की है कि क्या “इस्लामिक ग्रेटर मिडिलईस्ट” अमरीकी कल्पना “ग्रेटर मिडिलईस्ट” के मुक़ाबले में व्यवहारिक है? और इस योजना के सामने मौजूद चुनौतियां क्या है और इनका मुक़ाबला कैसे किया जा सकता है?
इस्लामी मध्यपूर्व के गठन की स्थिति में क्षेत्र में नया राजनैतिक वातावरण व्याप्त हो जाएगा। इसी स्थिति में समाज के गठन और इसके प्रबंधन तथा मानवीय समाज में न्याय, सम्मान और स्वतंत्रता की स्थापना के लिए निश्चित रूप से इस्लाम का सहारा लिया जाएगा। इस्लामिक मिडिल ईस्ट क्षेत्र में मौजूद तानाशाही सरकारों को चैलेंज करने के अतिरिक्त स्वाधीन इस्लामी सरकारों की स्थापना की भूमिका प्रशस्त करेगा और पश्चिमी लोकतंत्र के नुस्ख़े को भी अस्वीकार कर देगा।
इसी प्रकार अमरीका से घृणा और नफ़रत में वृद्धि होगी और वर्चस्ववाद और विस्तारवाद पर आधारित उसका वास्तविक चेहरा स्पष्ट हो जाएगा जिसकी पूरी कोशिश है कि क्षेत्र को एक सैन्य बैरक में परिवर्तित करके उसमें मौजूद समस्त प्राकृतिक संसाधनों को अपने नियंत्रण में ले ले।
ग्रेटर इस्लामिक मिडिलईस्ट की स्थापना की स्थिति में इस्राईल का जालीपन भी खुलकर सामने आ जाएगा और क्षेत्र की कोई सरकार उसे स्वीकार करने पर तैयार नहीं होगी।
दूसरी ओर अमरीका की ओर से पेश की गयी “ग्रेटर मिडिलईस्ट” की योजना क्षेत्र में अमरीकी हितों की रक्षा के लिए बनायी गयी है जिसका उद्देश्य अमरीकी हितों के के लिए ख़तरों का मुक़ाबला करना है।
इस्लामी मध्यपूर्व क्षेत्र में ईरान की शक्ति में वृद्धि और उसका इस्लामी जगत के लिए एक केन्द्र में परिवर्तित होने का कारण बनेगा जो विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के हितों के विपरीत समझा जाता है।
ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय देश कच्चे तेल को विश्व साम्राज्यवादी शक्तियों के विरुद्ध एक हथियार के रूप में प्रयोग कर सकते हैं और यह वह चीज़ है जो विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के लिए एक रणनैतिक ख़तरा समझी जाती है।
इस्लामिक मीडिलईस्ट के व्यवहारिक होने की स्थिति में एक शक्तिशाली इस्लामी ब्लाक अमरीकी मनमानी पर आधारित मौजूदा वर्ल्ड आर्डर को बुरी तरह धचका पहुंचाने की स्थिति में हो जाएगा। (जारी है)
अख़्तर रिज़वी।
(लेखक के विचारों से पार्स टूडे का सहमत होना आवश्यक नहीं है। )