तीन दिनों में टेलरसन की दूसरी क़तर यात्रा
https://parstoday.ir/hi/news/west_asia-i45418-तीन_दिनों_में_टेलरसन_की_दूसरी_क़तर_यात्रा
अमरीकी विदेशमंत्री पिछले तीन दिनों के भीतर दूसरी पर क़तर की यात्रा की।
(last modified 2023-04-09T06:25:50+00:00 )
Jul १३, २०१७ १६:४९ Asia/Kolkata
  • तीन दिनों में टेलरसन की दूसरी क़तर यात्रा

अमरीकी विदेशमंत्री पिछले तीन दिनों के भीतर दूसरी पर क़तर की यात्रा की।

क़तर और कुछ अरब देशों के बीच 5 जून से आरंभ तनाव अभी भी जारी है।  इस संकट के आरंभ में अमरीकी राष्ट्रपति और अमरीकी विदेशमंत्री के विरोधाभासी बयान सामने आए थे।  अब एेसा लग रहा है कि अमरीका, फ़ार्स की खाड़ी के अपने अरब घटक देशों के बीच मध्यस्तता कराना चाहता है।

रेक्स टेलरसन 10 जूलाई को कुवैत गए जिसके बाद 11 जूलाई को वे क़तर गए।  क़तर के बाद 12 जूलाई को वे सऊदी अरब पहुंचे और 13 जूलाई को फिर उन्होंने क़ुवैत तथा क़तर की यात्रा की।  क़तर पर प्रतिबंध लगाने वाले चार देशों के विदेश मंत्रियों के साथ अमरीकी विदेशमंत्री की वार्ता का ब्योरा तो अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है लेकिन यह कहा जा रहा है कि अमरीकी विदेशमंत्री, जद्दा बैठक से संबन्धित संदेश लेकर क़तर के अधिकारियों के पास गए हैं।  कुछ टीकाकारों का यह मानना है कि अमरीकी विदेशमंत्री का यह प्रयास है कि क़तर की ओर से आतंकवाद के समर्थन वाले दावे को निष्क्रय बनाया जाए।  इसी बीच टेलरसन, इस बात का प्रयास कर रहे हैं कि क़तर, संसार में सऊदी अरब की भूमिका को स्वीकार करते हुए रेयाज़ की नीतियों को चुनौती न दे।

टेलरसन, क़तर और उसपर प्रतिबंध लगाने वाले अरब देशों को निकट कराने का प्रयास इसलिए कर रहे हैं कि यह दोनो पक्ष, मध्यपूर्व में अमरीका के स्ट्रैटेजिक घटक हैं।  अमरीका के बाहर विदेश में क़तर में ही उसकी सबसे बड़ी हवाई छावनी है।  यह वह छावनी है जहां पर अमरीका के वे सैनिक रहते हैं जिन्होंने अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ युद्ध में भाग लिया और इसी प्रकार अमरीका के तथाकथित आतंकवाद विरोधी अभियान में भाग लेने वाले सैनिक भी इसी छावनी में रह रहे हैं।  मध्यपूर्व में सऊदी अरब, अमरीका का एेसा महत्वपूर्ण घटक है जो उसकी ओर से प्राॅक्सी वार लड़ता रहता है।  सऊदी अरब के पेट्रो डालरों के कारण अमरीका के निकट उसे विशेष महत्व प्राप्त है।

इन सब बातों के बावजूद दिखाई यह दे रहा है कि क़तर, सऊदी अरब की दादागीरी को किसी भी स्थिति में स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है।  यही कारण है कि वह यूरोप, तुर्की,रूस और ईरान पर भरोसा करते हुए रेयाज़ के मुक़ाबले में प्रतिरोध कर रहा है।  इस प्रकार क़तर यह सिद्ध करना चाहता है कि वह किसी भी स्थिति में दबाव में आने वाला नहीं है।