आतंकवाद के ख़िलाफ़ धर्मगुरुओं की मैदानी भूमिका+ फ़ोटो
कल तक जो लोग क़बा पहन कर और कंधे पर अबा डाले धार्मिक स्कूलों विशेषकर पवित्र नगर नजफ़ अशरफ़ के धार्मिक स्कूलों और क्लासों में इधर से उधर हाथों में किताबे लिए नज़र आए थे।
आज हम उन्हीं लोगों को इराक़ में सिर पर अम्मामा रखकर सेना की वर्दी पहने हुए देख रहे हैं, इनको देखकर आप नहीं कह सकते कि यह धार्मिक लोग या धर्म गुरु हैं, किन्तु इनकी पगड़ी या अम्मामे से पता चलता है।
इराक़ में हुआ क्या? क्या किसी धार्मिक पथभ्रष्टता ने सिर उठा लिया था जिसने अरब जगत के धर्म गुरुओं को हथियार उठाने पर मजबूर कर दिया या कौन सी ऐसी बात हो गयी जिसने धर्म गुरुओं को पढ़ने पढ़ाने से हटाकर रणक्षेत्र की ओर भेज दिया। क्या धार्मिक ज़िम्मेदारियों में कोई परिवर्तन पैदा हुआ है?
इसका मुख्य कारण ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता की ओर पलटता है। ईरानी टीवी चैनल ने ऐसे वीडियो दिखाए जिनमें धर्म गुरु सड़कों खड़े होकर लोगों को संबोधित कर रहे हैं और लोगों को शाही सरकार के विरुद्ध प्रदर्शनों में भाग लेने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद देश के विभिन्न कार्यालयों और शीर्ष पदों पर धर्मगुरु नियुक्त किए गये। ईरान के धर्मगुरुओं ने यही तक देश की सेवा नहीं की बल्कि ईरान और इराक़ युद्ध में भी यह लोग मोर्चे पर आगे ही नज़र आए। उन्होंने दुनिया पर अपनी छाप छोड़ दी, उन्होंने मैदाने जंग से लेकर सरकारी कार्य और अस्पतालों में घायलों की सेवा करके दुनिया को हैरान कर दिया।
दुनिया जिन्हें कल तक यह समझती थी कि यह लोग केवल मस्जिदों और मिंबरों के ही योग्य हैं, उनका लोहा आज मानने को विवश है। यह इस्लामी क्रांति की सफलता और उसके बाद के काल में ईरानी धर्म गुरुओं का हाल था। जब इराक़ पर दाइश ने हमला किया तो आरंभ में हालात सही थे और सभी समझ रहे थे कि सेना इन लोगों से निपट लेगी किन्तु विदेशों से दाइश के व्यापक समर्थन के कारण दाइश बग़दाद के निकट तक पहुंच गया था।
यहां पर इराक़ के वरिष्ठ धर्मगुरु आयतुल्लाह सीस्तानी ने जेहाद का फ़त्वा दे दिया, देखते ही देखते बड़ी संख्या में स्वयं सेवी देश को दाइश के चंगुल से स्वतंत्र कराने के लिए मैदाने जंग की ओर निकल पड़े, स्वयं सेवियों में बड़ी संख्या धर्मगुरूओं की थी जो सेना की वर्दी तो पहने थे किन्तु सिर पर पगड़ी भी पहने होते थे।
हर एक की ज़बान पर यही था कि पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कभी भी सामान्य कपड़ों में युद्ध नहीं किया बल्कि युद्ध के लिए विशेष वस्त्र पहनते थे। यहां पर भी धर्मगुरुओं ने पैग़म्बरे इस्लाम और हज़रत अली के मार्ग का ही अनुसरण किया। बहरहाल इराक़ को धर्मगुरुओं या यूं कहें कि पगड़ी ने एक बार फिर बचा लिया। (AK)
साभार “अलअख़बार”