बहरैन में आले ख़लीफ़ा शासन की धर्म विरोधी नीतियां
बहरैन के आले ख़लीफ़ा शासन ने मुहर्रम के महीने के निकट आते ही सुरक्षा के कड़े प्रबंध कर दिए हैं।
बहरैन के जानकार सूत्रों ने बताया है कि बहरैन की सुरक्षा संस्थाओं ने देश के धर्मगुरुओं, वक्ताओं और धार्मिक कार्यकर्ताओं को तलब करके कहा है कि जैसा मनामा प्रशासन चाहता है उसी प्रकार मजलिसे और शोक सभाएं आयोजित हों।
प्रशासन ने धमकी दी है कि यदि मुहर्रम की शोक सभाएं आयोजित करने में इस निर्देश की अनुदेखी की गयी और इसका पालन न किया गया तो विरोध करने वालों को जेल में डाल दिया जाएगा और कड़ी से कड़ी सज़ाएं दी जाएंगी।
बहरैन में आले ख़लीफ़ा शासन द्वारा जनता के अधिकारों का हनन, शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दमन, विरोधियों की नागरिकता छीनने, राजनैतिक पार्टियों और दलों को भंग करने और धर्म गुरुओं और नेताओं पर अंधा मुक़द्दमा चलाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि बहरैनी शासन खुलकर अपनी शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियां करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आस्थाओं का हनन है।
इस संबंध में मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए शांति संगठन ने बहरैन में धार्मिक स्वतंत्रता के दमन के जारी रहने की सूचना दी है। इस संगठन ने धार्मिक स्वतंत्रता पर एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें कहा गया है कि धार्मिक मूल्यों को अंजाम देने में शिया नागरिकों के अधिकारों को आले ख़लीफ़ा शासन के अधिकारियों की ओर से सुनुयोजित ढंग से हनन किया जा रहा है।
बहरैनी शासन के विरुद्ध जनता की क्रांति 14 फ़रवरी 2011 से जारी है। जनता देश में भेदभाव की समाप्ति और लोकतंत्र की स्थापना की मांग कर रही है। बहरैनी शासन ने खुले में मजलिसों और शोक सभाओं तथा जूलूसों पर प्रतिबंध लगा रखा है। बहरैन में क्रांति की लहर उठने के तुरंत बाद ही आले ख़लीफ़ा के तानाशाही शासन ने तुरंत ही शोक सभाओं और जूलूसों पर प्रतिबंध लगा दिए किन्तु बहरैन की जनता दमन की परवाह किए बिना भरपूर ढंग से शोक सभाओं और जूलूसों में भाग लेती रही है। (AK)