बहरैन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर शासन का क़हर
आले ख़लीफ़ा शासन ने बहरैन में कुछ इस तरह की परिस्थितियां उत्पन्न कर दी हैं कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और नागरिक अधिकार संगठनों के लिए कार्य करना बहुत कठिन हो गया है।
बहरैन के सुप्रीम कोर्ट ने आले ख़लीफ़ा शासन के न्याय एवं वक़्फ़ मंत्रालय की शिकायत पर वआद संगठन को भंग करने और उसकी संपत्ति को ज़ब्त करने का आदेश दिया है। इस संगठन पर आरोप है कि उसने देश के क़ानूनों का अपमान किया है और हिंसा को बढ़ावा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर वआद संगठन ने प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि देश में जनता के अधिकारों की प्राप्ति और राजनीतिक सुधारों की मांग के पूरा होने तक प्रयास जारी रहेंगे। इसके अलावा बहरैन के अलविफ़ाक़ जैसे दलों ने कि जिन्हें पहले ही भंग कर दिया गया है, आले ख़लीफ़ा शासन के इस क़दम की निंदा की है।
आले ख़लीफ़ा शासन ने देश में सरकार विरोधी राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा रखा है और अधिकांश वरिष्ठ नेताओं एवं कार्यकर्ताओं को जेल की सलाख़ों के पीछे धकेल दिया है। इससे पता चलता है कि बहरैन में पुलिसिया राज और तानाशाही का बोलबाला है।
वास्तव में बहरैनी अधिकारी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर दोगुना दबाव डालना चाहते हैं, ताकि वे अपने आंदोलन से पीछे हट जाए। इस प्रकार से बहरैनी जनता, नागरिक संगंठनों और मानवाधिकार संगंठनों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
आले ख़लीफ़ा शासन ने 2015 में आतंकवाद से मुक़ाबले के बहाने एक नया क़ानून पारित किया था, जिसके तहत पुलिस और सेना को पूरी छूट है कि वह जिसे चाहें आतंकवाद के समर्थन के आरोप में गिरफ़्तार कर लें और जिस संगठन या दल को चाहें प्रतिबंधित कर दें। इस तरह क़ानूनों ने आले ख़लीफ़ा शासन को एक संपूर्ण तानाशाही में बदल दिया है।