इस्राईल से निपटने के तरीक़े
"मैं ईश्वर से दुआ करता हूं कि आपकी इस संगोष्ठी को कामयाब करे और मैं यहीं से उन सभी लोगों का जो ज़िम्मेदारी का आभास रखते हैं, आहवान करते हैं कि वह ज़ायोनी शासन के विरुद्ध अपना संघर्ष जारी रखें"
यह शब्द ईरान की इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के उस संदेश के हैं जो उन्होंने लेबनान में प्रतिरोधकर्ता धर्मगुरुओं की अंतर्राष्ट्रीय युनियन के प्रमुख शैख़ माहिर हमूद के नाम लिखा था। इसी संदेश से हमें यह प्रेरणा मिली कि इस्राईल के खिलाफ़ इस्लामी देशों में जारी संघर्ष के तरीक़ों का जायज़ा लिया जाए।
प्रतिरोधकर्ता धर्मगुरुओं की अंतर्राष्ट्रीय युनियन और उसका बैरूत सम्मेलन
वर्ष 2014 में ईरान की राजधानी तेहरान में एक फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर एक सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसका शीर्षक था इस्लामी धर्मगुरू फ़िलिस्तीन का समर्थन करते हैं। इसी सम्मेलन में प्रतिरोधकर्ता धर्मगुरुओं के अंतर्राष्ट्रीय संघ की स्थापना पर सहमति हुई। तेहरान सम्मेलन 51 दिन तक चलने वाले ग़ज्ज़ा युद्ध में ज़ायोनी शासन की ओर से किए गए बर्बर हमलों पर प्रतिक्रिया के रूप में आयोजित हुआ था। सम्मेलन में 54 देशों के 200 से अधिक धर्मगुरुओं और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया था।
कई तरह से ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी है।
एक तो BDS के नाम से दुनिया के कई देशों में जारी इस्राईल विरोधी आंदोलन है। यह आंदोलन आर्थिक, सामाजिक तथा स्पोर्ट्स के क्षेत्रों में इस्राईल के बहिष्कार पर केन्द्रित है। इस आंदोलन ने इस्राईल को इतना परेशान कर दिया है कि इस्राईली अधिकारी अमरीका और अन्य घटक सरकारों से मिलकर इस आंदोलन को रुकवाने का प्रयास कर रहे हैं। कारण यह है कि इस्राईल ने हालिया दशकों के दौरान अरब व इस्लामी देशों से चिकित्सा, खेल, संस्कृति आदि क्षेत्रों में संबंध बनाने की कोशिश की ताकि राजनैतिक और कूटनैतिक संबंधों की स्थापना का रास्ता खुल जाए और इस्राईल को भी एक देश के रूप में मान लिया जाए।
इस्राईल ने इस उद्देश्य से अपने कुछ क़रीबी अरब देशों और फ़िलिस्तीनी नेताओं की मदद से सम्मेलनों का आयोजन किया। इस्राईल की इन कोशिशों का जवाब नए BDS आंदोलन से दिया जा सकता है जिसकी शुरुआत यूरोप से हुई और फिर वह विश्व स्तर पर अनेक देशों में फैल गया। नया BDS आंदोलन अरब व इस्लामी देशों में प्रभावी रूप से शुरू होना चाहिए क्योंकि अरब व इस्लामी देशों में अभी इस प्रकार के आंदोलन की कमी है।
दूसरे इस्राईल के ख़िलाफ़ क़ानूनी और राजनैतिक कार्यवाहियां अंजाम देना है। अब तक इन तरीक़ों पर उस तरह ध्यान नहीं दिया गया जिस तरह दिया जाना चाहिए था। क्योंकि कुछ लोग इस भ्रम में हैं कि दुनिया के बड़ी क़ानूनी संस्थाओं और मानवाधिकार संगठनों में बड़ी शक्तियों की पैठ की वजह से इस प्रकार के प्रयासों का कोई फ़ायदा नहीं होगा। मगर तथ्य है कि इस प्रक्रिया में कठिनाइयां तो होंगी मगर इससे सारी दुनिया का ध्यान इस मुद्दे पर केन्द्रित रहेगा और अतिग्रहणकारी ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष का दायर बढ़ेगा। इस संदर्भ में कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं। जैसे कि लेबनान की सीमा पर और अतिग्रहित भाग में तैनात अंतर्राष्ट्रीय शांति बल युनीफ़ेल की भूमिका में बदलाव की कोशिश। हिज़्बुल्लाह के प्रमुख सैयद हसन नसरुल्लाह ने अपने भाषण में कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीकी राजदूत ने जो इस्राईलियों से भी ज़्यादा बड़ी नस्लभेदी हैं, उनकी पहल पर हाल ही में अमरीका और ब्रिटेन ने सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1701 में बदलाव करके युनिफ़ेल की भूमिका को इस्राईल के हितों के अनुरूप बदलने का प्रयास किया। इस स्थिति को देखते हुए लेबनान का विदेश मंत्रालय सक्रिय हो गया और उसने ईरान के विदेश मंत्रालय की मदद से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य देशों से संपर्क किया और अमरीका और ब्रिटेन की कोशिश को नाकाम बना दिया।
दूसरी मिसाल युनेस्को से अमरीका के बाहर निकल जाने की है। अमरीका ने अचानक युनेस्को से बाहर निकल जाने का फ़ैसला किया और इसके कारण के बारे में बताया कि यह संस्था ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ काम कर रही है। हुआ यह था कि युनेस्को की एक समिति ने अलख़लील शहर को जो फ़िलिस्तीन की धरती पर स्थित है उन अंतर्राष्ट्रीय धरोहरों की सूचि में शामिल कर लिया जो ख़तरे में हैं।
इस्लामी क्रान्ति के वरिष्ठ नेता ने अपने संदेश में कहा कि ज़ायोनी शासन से लड़ने के लिए अलग अलग तरीक़े अपनाना चाहिए अतः यदि इस्लामी व अरब जगत में BDS आंदोलन शुरू किया और साथ ही सरकारी व ग़ैर सरकारी सतह पर राजनैतिक व क़ानूनी कार्यवाहियां शुरू की जाएं तो विदित रूप से उनुपयोगी नज़र आने वाले यह तरीक़े अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपना असर दिखाने लगेंगे।
साभार अलवक़्त