परमाणु शक्ति बनना चाहता है सऊदी अरब
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सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान बड़ी मेहनत से अपने देश को परमाणु शक्ति बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसका उद्देश्य परमाणु तकनीक के वैज्ञानिक फ़ायदे हासिल करना नहीं बल्कि इस्लामी गणतंत्र ईरान की बराबरी करना है जिसने अपने विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की मदद से परमाणु तकनीक हासिल कर ली है और  पश्चिमी देशों के प्रतिबंध भी इस देश का रास्ता नहीं रोक सके।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Dec ०२, २०१७ १३:५३ Asia/Kolkata
  • परमाणु शक्ति बनना चाहता है सऊदी अरब

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन सलमान बड़ी मेहनत से अपने देश को परमाणु शक्ति बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसका उद्देश्य परमाणु तकनीक के वैज्ञानिक फ़ायदे हासिल करना नहीं बल्कि इस्लामी गणतंत्र ईरान की बराबरी करना है जिसने अपने विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की मदद से परमाणु तकनीक हासिल कर ली है और  पश्चिमी देशों के प्रतिबंध भी इस देश का रास्ता नहीं रोक सके।

जब से विश्व शक्तियों के साथ ईरान का परमाणु समझौता हुआ है उस समय से सऊदी अरब के राजकुमारों को यह लग रहा है कि ईरान की ताक़त में बहुत तेज़ी से बढ़ोत्तरी होती जा रही है। ईरान से अपने गहरे द्वेष के चलते सऊदी सरकार ने ख़ुद को इस्राईल से क़रीब करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी।

सऊदी अरब ने जब यह देखा कि विश्व की बड़ी शक्तियों ने ईरान से परमाणु समझौता कर लिया है और प्रतिबंध हटाने और संबंध बढ़ाने का सिलसिला शुरू हो गया है, सीरिया और इराक़ में सऊदी अरब ने जो बदलाव लाने की कोशिश की थी वह भी नाकाम हो गई है और दाइश का भी सफ़ाया हो चुका है तो अब रियाज़ सरकार के पास यही एक रास्ता बचा है कि परमाणु तकनीक प्राप्त करके ईरान का मुक़ाबला करे।

अमरीका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में परमाणु अप्रसार तथा महाविनाश के हथियारों के मामलों के निदेशक क्रिस्टोफ़र फ़ोर्ड ने गुरुवार को कहा कि मुहम्मद बिन सलमान ने सऊदी अरब को परमाणु तकनीक से समृद्ध करने के विषय पर बातचीत के लिए उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल वाशिंग्टन भेजा था। फ़ोर्ड ने कहा कि सऊदी अरब की इस मांग पर ट्रम्प प्रशासन ने जो जवाब दिया वह मेरे लिए बहुत दुखद बात है। उन्होंने सिनेट के समक्ष भी कहा कि ट्रम्प प्रशासन ने परमाणु मामले में सऊदी अरब से बातचीत शुरू कर दी है जो पूर्व राष्ट्रपति बाराक ओबामा के शासन काल में इसलिए रोक दी गई थी कि सऊदी अरब ने इस संदर्भ में अमरीका की कठोर शर्तों को मानने से इंकार कर दिया था। यह शर्तें इस लिए लगाई गई थीं कि सऊदी अरब परमाणु कार्यक्रम को परमाणु हथियार बनाने के लिए प्रयोग न कर सके।

एक अमरीकी वेबसाइट ने भी एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें अमरीकी सांसदों ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई है कि ट्रम्प प्रशासन ने कड़ी शर्तों में कुछ नर्मी कर दी है जिसका नतीजा युद्ध की आग भड़क जाने के रूप में निकल सकता है। अमरीका के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि बड़े अमरीकी अधिकारियों को सऊदी अरब की परमाणु तकनीक की मांग एक आंख नहीं भाती।

अमरीकी आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि ट्रम्प के वाइट हाउस में पहुंचने के बाद से परमाणु विषय में सऊदी अरब से पुनः बातचीत शुरू हो चुकी है। माइकल फ़्लेन जब अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बने तो अमरीका में सऊदी लाबी की बाछें खिल गईं और परमाणु मामले पर बातचीत तेज़ हो गई। बहरहाल फ़्लेन को पद छोड़ना पड़ा है।

यह भी सूचनाएं है कि अमरीकी परमाणु कंपनियों के बीच सऊदी अरब में परमाणु संयंत्र के निर्माण के मुद्दे पर प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। यही नहीं रूस, दक्षिणी कोरिया और फ़्रांस की कंपनियां भी प्रतिस्पर्धा के मौदान में कूद पड़ी हैं।

अब देखना यह है कि सऊदी अरब को परमाणु तकनीक मिल पाती है या नहीं और यदि मिलती है तो किन शर्तों पर? मगर इतना तो तय है कि यह रास्ता आसान नहीं है।

साभार अलवक़्त