बहरैन, सज़ाओं से जनता के हौसले पस्त नहीं किए जा सकते
बहरैन के अलवफ़ा अल इस्लामी धड़े ने शुक्रवार को एक बयान जारी करके बल दिया है कि सज़ाए मौत और नागरिकता रद्द करने के आदेश, बहरैनी जनता को घुटने टेकने पर विवश नहीं कर सकते।
हमारे संवाददाता की रिपोर्ट के अनुसार अलवफ़ा अलइस्लामी ने अपने बयान में कहा कि आले ख़लीफ़ा शासन ने 31 जनवरी 2018 को बहरैन की जनता के विरुद्ध जो सज़ाए मौत और नागरिकता रद्द करने का आदेश जारी किया है उससे राजनैतिक, सुरक्षा और आर्थिक सहित समस्त क्षेत्रों में बहरैनी शासन का संकट और अधिक गहरा जाएगा।
बहरैनी शासन के इस विरोधी धड़े के बयान में आया है कि जनता के प्रतिरोध के मुक़ाबले में बहरैनी अदालत के फ़ैसले से जनता के हौसले पस्त नहीं होंगे और इससे तानाशाही सरकार के विरुद्ध जनता के प्रतिरोध और आंदोलन में वृद्धि होगी।
ज्ञात रहे कि बहरैन की अदालत ने अपनी दमनात्मक कार्यवाही जारी रखते हुए देश के 14 नागरिकों को उम्र क़ैद और मौत की सज़ा सुनाई है।
बहरैनी अदालत ने गुरुवार को एक राजनैतिक मामले की सुनवाई करते हुए देश के 25 नागरिकों की नागरिकता रद्द कर दी।
इस मामले की सुनवाई करते हुए बहरैनी अदालत ने एक शिया मुसलमान को सज़ाए मौत और 13 अन्य को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है। बहरैनी अदालत ने इसी प्रकार चार बहरैनी लड़कियों को पांच साल क़ैद की सज़ा सुनाई है।
दूसरी ओर बहरैन के वरिष्ठ शिया धर्मगुरु शैख़ ईसा क़ासिम आप्रेशन के बाद आईसीयू में भर्ती हो गये हैं।
बहरैन के लूलू टीवी चैनल की रिपोर्ट के अनुसार शैख़ ईसा क़ासिम का शुक्रवार को आप्रेशन हुआ और उसके बाद उन्हें आईसीयू के वार्ड में भर्ती करा दिया गया। इससे पहले बहरैन की अलवेफ़ाक़ पार्टी ने देश के शिया धर्मगुरु शैख़ ईसा क़ासिम के आप्रेशन की सूचना दी थी।
बहरैनी प्रशासन पिछले छह वर्षों से 11 हज़ार से अधिक नागरिकों को निराधार आरोपों के अंतर्गत गिरफ़्तार कर चुकी है जिनमें से सैकड़ों की नागरिकता रद्द करके देश से निकाल चुकी है।
बहरैन में 14 फ़रवरी से शाही सरकार के विरुद्ध जनांदोलन जारी है और जनता देश में न्याय और लोकतंत्र की स्थापना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मांग कर रही है। (AK)