बहरैन, जनता का दमन और न्यायालय का सितम
बहरैनी प्रशासन की अपील कोर्ट ने देश के सबसे बड़े विपक्षी दल अलवेफ़ाक़ का लाइसेंस बहाल करने की अपील ठुकरा दी है।
बहरैन के सबसे बड़े विपक्षीय दल अलवेफ़ाक़ ने पार्टी का लाइसेंस रद्द किए जाने के फ़ैसले के विरुद्ध अदालत में याचिका दर्ज की थी और अदालत से इस मामले की समीक्षा की अपील की थी किन्तु अदालत ने अपने पहले वाले फ़ैसले को बाक़ी रखते हुए अलवेफ़ाक़ की याचिका ठुकरा दी। अदालत ने इसके साथ ही याचिकाकर्ता को शिकायत ख़र्चा और क़ानूनी ख़र्च के लिए 100 दिनार का हर्जाना अदा करने को कहा है।
बहरैन की अदालत ने 17 जुलाई वर्ष 2015 को एक आदेश जारी करके अलवेफ़ाक़ पार्टी को भंग करने और उसके समस्त मालों को ज़ब्त करने का आदेश दिया था। अदालत के इस फ़ैसले पर जनता ने भारी रोष व्यक्त किया और निरंतर प्रदर्शन हुए।
बहरैन में 14 फ़रवरी 2011 से इस देश में अत्याचारी शासन के ख़िलाफ़ जनता का प्रदर्शन जारी है। आले ख़लीफ़ा शासन ने जनता के विरोध को दबाने के लिए विपक्ष के बहुत से नेताओं को गिरफ़्तार और उनके ख़िलाफ़ झूठे केस बनाकर उन्हें लंबी अवधि की क़ैद की सज़ा दी है या उन्हें घर में क़ैद कर दिया है।
इसी मध्य बहरैनी मानवाधिकार केन्द्र का भी कहना है कि बहरैनी प्रशासन राजनैतिक बदले की भावना के अंतर्गत मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर दबाव डाल रहा है और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गतिविधियों को रोकने के लिए भय की नीति अपनाए हुए हैं।
बहरैनी प्रशासन ने देश में हर प्रकार की राजनैतिक गतिविधियों पर रोक लगा रखी है और इसी परिधि में वह नागरिक संगठनों और संस्थाओं को भी देश में सहन नहीं करता, यह चीज़ बहरैन में पुलिसिया राजनीति के गहरने का चिन्ह है।
बहरैनी प्रशासन देश के राजनैतिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर डबल दबाव डालकर उन्हें सरकार के घुटन भरे वातावरण के विरुद्ध आवाज़ उठाने से रोकने का प्रयास कर रहा है किन्तु बहरैनी प्रशासन को यह समझ लेना चाहिए कि बहरैन की क्रांति को आरंभ हुए सात वर्ष का समय बीत रहा है और प्रशासन की धमकियों और उसके अत्याचारपूर्ण बर्ताव के बावजूद बहरैन की जनता शांतिपूर्ण ढंग से अपने मार्ग को जारी रखे हुए है और यह इस बात का चिन्ह है कि बहरैनी जनता किसी भी दबाव के सामने झुकने वाली नहीं है। (AK)