वापसी के अधिकार की रैली, इस्राईल के लिए एक डरावना सपना
हालिया दिनों में वापसी के अधिकार की रैली के अंतर्गत फ़िलिस्तीनियों ने ज़ायोनी शासन के ख़िलाफ़ जो प्रदर्शन किए हैं वह बहुत विस्तृत आयाम ले चुके हैं और निरंतर जारी हैं। इस रैली ने ज़ायोनी अधिकारियों की चिंता में बहुत अधिक वृद्धि कर दी है और उनके लिए एक डरावने सपने में बदल गई है।
ग़ज़्ज़ा पट्टी के हज़ारों फ़िलिस्तीनियों ने शुक्रवार को लगातार दूसरे हफ़्ते अतिग्रहित फ़िलिस्तीन के सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापक प्रदर्शन किए हैं। फ़िलिस्तीनी जनता ने 30 अप्रैल से, जो भूमि दिवस के नाम से मशहूर है, वापसी के अधिकार के नाम से शांतिपूर्ण रैलियां आयोजित की हैं। इन रैलियों पर ज़ायोनी सैनिकों ने अमानवीय ढंग से हमले किए हैं जिनमें अब तक तीस से अधिक फ़िलिस्तीनी शहीद हो चुके हैं।
वापसी के अधिकार की रैली के अनेक संदेश हैं। इसका पहला संदेश तो यह है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र ज़िंदा है और उसे इस्राईल के मुक़ाबले में प्रतिरोध से रोकने का कोई भी कुप्रयास सफल नहीं होगा। इसका दूसरा संदेश यह है कि फ़िलिस्तीनी राष्ट्र, ज़ायोनी शासन से मुक़ाबले के लिए नई शैलियां तैयार करने, अपनी समस्याओं से जनमत को अवगत कराने और उसका ध्यान ज़ायोनियों के अपराधों की ओर आकृष्ट कराने में सक्षम है। इस घटना ने ज़ायोनियों को यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि सात दशक तक दुखों, संकटों और निर्वासन झेलने के बावजूद फ़िलिस्तीनी अपनी मातृभूमि को भूले नहीं हैं।
वापसी के अधिकार की रैली का एक अन्य संदेश अमरीका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के लिए है और वह यह कि उनकी ओर से बैतुल मुक़द्दस को इस्राईल की राजधानी के रूप में स्वीकार करने की घोषणा निरुत्तर नहीं रहेगी और उसे फ़िलिस्तीनियों के कड़े जवाब का सामना करना पड़ेगा। इन्हीं बातों के चलते ज़ायोनियों और उनके घटकों विशेष कर अमरीका में गहरी चिंता व्याप्त हो गई है। इस रैली ने ज़ायोनियों को पगला दिया है और उनके द्वारा अवैध इस्राईली शासन की स्थापना की सत्तरवीं वर्षगांठ के समारोहों के आयोजन की कोशिश की राह में रुकावटें खड़ी कर दी हैं। (HN)