बहरैन में महिला क़ैदियों की रिहाई के लिए व्यापक अभियान
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आज़ादी व अधिकार के समर्थक अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र ने बहरैन की जेलों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और महिला अधिकार के उल्लंघन के बारे में प्राप्त रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए इस देश के महान्यायवादी से मांग की है कि वह इस बात की जांच कराएं कि बहरैन में महिलाओं की जेल का संचालन अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों व समझौतों के अनुसार हो रहा है या नहीं।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Apr १८, २०१८ १३:४१ Asia/Kolkata

आज़ादी व अधिकार के समर्थक अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र ने बहरैन की जेलों में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और महिला अधिकार के उल्लंघन के बारे में प्राप्त रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए इस देश के महान्यायवादी से मांग की है कि वह इस बात की जांच कराएं कि बहरैन में महिलाओं की जेल का संचालन अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों व समझौतों के अनुसार हो रहा है या नहीं।

इस बीच बहरैन में महिला क़ैदियों की रिहाई का अभियान शुरु हुआ है।

वास्तव में बहरैन में 14 फ़रवरी 2011 से शुरु हुयी जनक्रान्ति में महिलाओं का सीधे तौर पर और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से योगदान है। महिलाएं शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में सीधे तौर पर शामिल होती हैं या घर के पुरुष सदस्यों के ख़िलाफ़ आले ख़लीफ़ा शासन के हिंसक व्यवहार को अप्रत्यक्ष रूप से सहन करती हैं और यह शासन एक परिवार के पुरुष सदस्य पर दबाव डालने के लिए उसके घर की महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार करता है।

इस समय बहरैन के ईसा शहर की जेल में दसियों महिलाओं को राजनैतिक इल्ज़ाम लगाकर जेल में डाल दिया गया है। इन महिलाओं में डॉक्टर, नर्स, शिक्षक और साहित्यकार शामिल हैं। बहरैनी पुलिस, जेल में महिला अधिकार का हनन करने के साथ साथ उनके ख़िलाफ़ व्यापक हिंसा करती है। आयात अलक़िरमिजी बहरैन की मशहूर शायर हैं जिन्हें आले ख़लीफ़ा शासन के ख़िलाफ़ दृष्टिकोण अपनाने की वजह से जेल में डाल दिया गया और उन्हें यातना दी गयी।

बहरैनी महिलाओं के ख़िलाफ़ सबसे जघन्य अपराध यह है कि बड़ी संख्या में महिला क़ैदियों को सिर्फ़ इसलिए जेल में डाल कर यातनाएं दी जा रही हैं क्योंकि राजनैतिक कार्यकर्ता उनके रिश्तेदार हैं। इन महिलाओं में गर्भवती भी हैं और 15 साल से कम उम्र की लड़कियां भी हैं।

इन हालात के मद्देनज़र, बहरैनी कार्यकर्ताओं ने सोशल नेटवर्क पर 11 अप्रैल 2018 को महिला क़ैदियों की रिहाई के लिए अभियान शुरु किया है और देश के नागरिकों से ज़्यादा से ज़्यादा इस अभियान से जुड़ने की अपील की है। हालांकि आले ख़लीफ़ा शासन अमरीका सहित पश्चिमी देशों और सऊदी अरब का समर्थन हासिल होने की वजह से जनता की मांग पर ध्यान नहीं दे रहा है लेकिन यह अभियान इस शासन के ख़िलाफ़ जनमत की ओर से दबाव को बढ़ा सकता है। (MAQ/T)