अमरीका और इस्राईल जैसी शक्तियां हिज़्बुल्लाह के सामने इतनी बेबस क्यों?
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आज यह बात किसी से ढकी छुपी नहीं है कि सीरिया में आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिज़्बुल्लाह ने अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jul १५, २०१८ १४:०१ Asia/Kolkata
  • अमरीका और इस्राईल जैसी शक्तियां हिज़्बुल्लाह के सामने इतनी बेबस क्यों?

आज यह बात किसी से ढकी छुपी नहीं है कि सीरिया में आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में हिज़्बुल्लाह ने अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2011-12 में जब आतंकवाद की काली आंधी ने पूरे सीरिया को अपनी चपेट में ले लिया था और हिंसा के भंवर में फंसकर दमिश्क़ हमेशा के लिए अपनी पहचान खोने वाला था, उस समय सीरियाई सरकार ने लेबनान के शक्तिशाली शिया प्रतिरोधी संगठन हिज़्बुल्लाह से मदद की गुहार लगाई।

हिज़्बुल्लाह के बहादुर लड़ाके इस्राईल और विश्व की कुछ बड़ी शक्तियों द्वार भड़काई गई इस आग में कूद पड़े, जिसके बाद से युद्ध का नक़्शा बदलना शुरू हो गया।

हालांकि आतंकवाद समर्थक पश्चिम-अरब गठजोड़ जो क्षेत्र में इस्राईल की विस्तारवादी नीतियों में सीरियाई राष्ट्रपति बशार असद को सबसे बड़ी रुकावट समझता है, इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था और उसने अपने लक्ष्यों को साधने के लिए दुनिया के सबसे खूंख़ार आतंकवादी गुट दाइश को जन्म दिया और साम्प्रदायिकात की आग भड़काकर शिया और सुन्नी मुसलमानों को आपस में लड़ाने का प्रयास किया।

आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई जब और अधिक कठिन चरण में पहुंची तो सीरियाई सरकार ने ईरान और उसके बाद रूस से समर्थन की अपील की। इस कड़ी में इन तीन ताक़तों हिज़्बुल्लाह, ईरान और रूस के जुड़ने से सीरियाई सरकार का क़िला अभेद हो गया और आतंकवाद अपनी मौत आप मारा गया।

इस मोर्चे पर अपनी पराजय को देखकर दुश्मन शक्तियों ने अपनी चाल बदली है और अब वह प्रतिरोध की इस मज़बूत कड़ी को ही तोड़ना चाहती हैं।

इसके लिए अमरीका और इस्राईल रूस को इस बात के लिए सहमत करने की कोशिश कर रहे हैं कि हिज़्बुल्लाह और ईरान को सीरिया से बाहर निकाल दिया जाए।

अमरीकी और इस्राईली नेता जो कल बशार असद को सत्ता में एक लम्हे के लिए बर्दाश्त नहीं कर रहे थे, आज खुलेआम यह एलान कर रहे हैं कि असद सीरिया के राष्ट्रपति के रूप में उन्हें स्वीकर हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में जब वे हिज़्बुल्लाह और ईरान को सीरिया से बाहर निकाल दें।

इस संबंध में असद का क्या दृष्टिकोण है, यह तो दूर की बात है रूसी अधिकारियों ने ही अमरीका और इस्राईल की इस चाल पर पानी फेर दिया है।

मास्को ने साफ़ शब्दों में यह घोषणा कर दी है कि हिज़्बुल्लाह और ईरान सीरिया में आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में दो मज़बूत स्तंभ हैं और इस लड़ाई से उन्हें अलग करने की बात स्वीकार्य नहीं है।

शनिवार को ही रूस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा है कि सीरिया में आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेंकने से पहले, हिज़्बुल्लाह को निकाले जाने की बात बेईमानी है और यह किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है।

अब दुनिया भर की निगाहें सोमवार को हेलसिंकी में अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन की मुलाक़ात पर टिकी हैं।

इस मुलाक़ात में सीरिया में हिज़्बुल्लाह और ईरान की उपस्थिति के विषय पर चर्चा होगी, लेकिन क्या ट्रम्प अपने रूसी समकक्ष को अपने दृष्टिकोण से सहमत कर पायेंगे? पुतिन की नीतियों पर नज़र रखने वालों के लिए यह सवाल काफ़ी हद तक स्पष्ट है, क्योंकि पुतिन अपने सहयोगियों और अपने राष्ट्रहितों को सर्वोपरि रखते हैं। msm