यमन, अपराधी गठबंधन की हवा निकल गयी!!!
यमन में आतंकवादी गुट अलक़ायदा से सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात की सरकारों की सांठगांठ की रिपोर्ट सामने आने के बाद यमन में हो रहे खेल का पता चलता है।
अब यहां पर यह सवाल उठता है कि क्या सऊदी अरब और इमारात को यमन में जीत हासिल करने में कठिनाइयों का सामना है जो उन्हें अलक़ायदा जैसे आतंकी संगठन का साथ लेना पड़ रहा है?
यमन में वर्ष 2014 में क्रांति आई और उसके बाद से ही इसस क्रांति को विफल बनाने के लिए आंतरिक व बाहरी स्तर पर प्रयास शुरु हो गये और आख़िरकार सऊदी अरब ने तथाकथित अरब गठबंधन का गठन करके यमन पर व्यापाक हमले शुरु कर दिए। निर्धन देश यमन में सूचना और गुप्तचर विभाग में पैदा होने वाले शून्य और अशांति के कारण बहुत शीघ्र ही अलक़ायदा और दाइश सहित बहुत से आतंकवादी गुट उभर कर सामने आ गये किन्तु यमन के दक्षिणी प्रांतों में अलक़ायदा और दाइश की गतिविधियों के बढ़ने की वजह से हमलावर गठबंधन ने अपने हमलों का औचित्य दर्शाने और यमन में आतंकवादियों की बढ़ती गतिविधियों से मुक़ाबले के बहाने इस निर्धन देश पर अपने पाश्विक हमलों का क्रम शुरु कर दिया।
यह तो दर्पण का एक रुख़ था किन्तु दूसरा रूख तब सामने आया जब सऊदी अरब के नेतृत्व वाले अरब गठबंधन के यमन में अलक़ायदा और दाइश से संबंधों से पर्दा उठा।
यमन पर सऊदी अरब बिना अमरीका और पश्चिमी देशों के इशारे पर हमला कर ही नहीं सकता था और यहीं पर वाशिंग्टन और आतंकवादी गुटों के बीच सहयोग की बात भी सामने आती है। वाशिंग्टन और आतंकवादी गुटों के बीच सहयोग की यह कोई नई बात नहीं है। इससे पहले इराक़ और सीरिया में भी अमरीका आतंकवादी गुटों का भरपूर समर्थन करता रहा और कर रहा है। यही नहीं अफ़ग़ानिस्तान में दाइश को पुनर्जीवित करने में भी अमरीका की मुख्य भूमिका है।
रिपोर्टों में बताया गया है कि यमन के जनांदोलन अंसारुल्लाह के विरुद्ध ज़मीनी कार्यवाही के लिए सऊदी अरब अलक़ायदा और दाइश के आतंकियों की मदद ले रहा है जबकि हवाई हमलों में अमरीका और ज़ायोनी शासन उसका भरपूर साथ दे ही रहे हैं। वास्तविकता पर नज़र डालने से पता चलता है कि निर्धन अरब देश पर सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के तीन वर्षों से जारी व्यापक हमलों के बावजूद तथाकथित गठबंधन अपना कोई भी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सका है बल्कि उसे बहुत अधिक सामरिक नुक़सान उठाना पड़ा है और उसके सैन्य ख़र्चे बढ़ गये।
यमन पर हमला करने वाले अरब गठबंधन ने यमन में अपने मोहरों को पिटता देखकर पूर्वी यूरोप, अफ़्रीक़ा से लेकर मध्य अमरीका तक से विदेशी किराए के ट्टुओं को युद्ध में शामिल करने का भी प्रयास ताकि इस प्रकार से उसे कोई सफलता हाथ लग जाए। अलहुदैदा बंदरगाह पर क़ब्ज़े का प्रयास इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
बहरहाल सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात के महलों में आराम करने वाले, कड़ी धूप में नंगे पैर किस प्रकार पहाड़ों पर युद्ध कर सकते हैं, यह हौसला तो यमन के जनांदोलन अंसारुल्लाह के जियालों को देखकर मिलता है जिन्होंने भूखे पेट होकर, हमलावरों की हवा निकाल दी। (AK)