इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद के ख़िलाफ़ आंदोलन क्यों किया था?
30 अक्तूबर को हर साल की तरह दुनिया भर के न्याय प्रेमी विशेषकर शिया मुसलमान इमाम हुसैन (अ) का चेहलुम मनायेंगे। इस अवसर पर इराक़ के पवित्र नगर कर्बला में लाखों लोग एकत्रित होकर इंसानियत के लिए अपनी और अपने साथियों की जान की क़ुर्बानी देने वाले अपने इमाम को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।

61 हिजरी या सन् 680 में घटने वाली कर्बला की घटना मानव इतिहास की ऐसी घटना है, जिसने किसी भी घटना की तुलना में इंसान को सबसे अधिक प्रभावित किया है।
इमाम हुसैन (अ) ने यज़ीद के शासन के ख़िलाफ़ आंदोलन क्यों क्या था? जिसके नतीजे में कर्बला में युद्ध हुआ।
इमाम हुसैन (अ) के बड़े भाई इमाम हसन (अ) और दमिश्क़ के शासक माविया के बीच युद्ध टालने के लिए एक समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत माविया को अपना उत्तराधिकारी घोषित नहीं करना था, लेकिन माविया ने इस समझौते का उल्लंघन किया और अपने बेटे यज़ीद को मुसलमानों का ख़लीफ़ा घोषित कर दिया। यज़ीद ने तख़्त पर बैठते ही मुसलमानों के बीच अपने शासन को वैध क़रार देने के लिए इमाम हुसैन (अ) से बैयत तलब की या अपने अवैध शासन के वर्चस्व को स्वीकार करने का आदेश दिया।

यज़ीद एक भ्रष्ट व्यक्ति था जो खुलेआम इस्लाम के सिद्धांतों का मज़ाक़ उड़ाता था। कोई ऐसी बुराई नहीं थी जो उसमें नहीं पायी जाती थी। इसलिए इमाम हुसैन (अ) ने उसके शासन को औपचारिकता प्रदान करने से साफ़ इनकार कर दिया। यज़ीद ने इमाम हुसैन की हत्या की योजना बनाई। इमाम हुसैन अच्छी तरह जानते थे कि यज़ीद की बैयत के इनकार का अंजाम जान की क़ुर्बानी है। इसलिए इमाम हुसैन (अ) ने अपने परिवार, कुछ निकट परिजनों और साथियों के साथ इराक़ स्थित कूफ़े शहर का रुख़ किया, ताकि लोगों का समर्थन जुटाकर इतिहास के सबसे भ्रष्ट शासक के ख़िलाफ़ प्रतिरोध कर सकें।
यज़ीद और उसके कमांडरों ने भरपूर प्रयास किया कि इमाम हुसैन (अ) कूफ़ा शहर में प्रवेश नहीं कर पाएं। उसकी सेना ने इमाम हुसैन और उनके साथियों को कूफ़ा से क़रीब 80 किलोमीटर पहले कर्बला में रोक लिया। उनकी घेराबंदी कर ली और पानी बंद कर दिया। मोहर्रम की 10 तारीख़ को इमाम हुसैन (अ) अपने 72 साथियों के साथ भूख और प्यास में एक एक करके यज़ीद की सेना के हाथों शहीद हो गए।
ख़ुद इमाम हुसैन ने अपने इस आंदोलन के उद्देश्य का उल्लेख करते हुए फ़रमाया थाः मैंने यह आंदोलन अपने नाना (पैग़म्बरे इस्लाम) के दीन को बचाने के लिए और लोगों को सत्य का मार्ग दिखाने के लिए किया है। इमाम हुसैन ने अपनी और अपने साथियों की क़ुर्बानी देकर रहती दुनिया तक यह संदेश दे दिया कि सत्य और हक़ को बचाने के लिए जान जा सकती है, लेकिन अत्याचार और हिंसा को सहन नहीं किया जा सकता। msm