डील ऑफ़ द सेंचुरी, विस्तारवाद का अंत नहीं है ...
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डील ऑफ़ द सेंचुरी के बारे में तरह तरह के अनुमानों के बाद आख़िरकार अमरीका के राष्ट्रपति ने मंगलवार को ज़ायोनी प्रधानमंत्री के साथ इस योजना के मुख्य पहलुओं को सार्वजनिक कर ही दिया।
(last modified 2023-04-09T02:55:50+00:00 )
Jan २९, २०२० ११:४९ Asia/Kolkata
  • डील ऑफ़ द सेंचुरी, विस्तारवाद का अंत नहीं है ...

डील ऑफ़ द सेंचुरी के बारे में तरह तरह के अनुमानों के बाद आख़िरकार अमरीका के राष्ट्रपति ने मंगलवार को ज़ायोनी प्रधानमंत्री के साथ इस योजना के मुख्य पहलुओं को सार्वजनिक कर ही दिया।

डोनल्ड ट्रम्प और बेनयामिन नेतनयाहू ने जिस योजना का अनावरण किया है, वह उन सूचनाओं से अलग नहीं है जो इससे पहले धीरे धीरे सामने आ रही थीं और इससे यह स्पष्ट हो गया कि वह सूचनाएं जान बूझ कर लीक की गई थीं ताकि पहले चरण में इस योजना के बारे में फ़िलिस्तीनियों और दूसरे चरण में इस्लामी जगत की प्रतिक्रिया को आंका जा सके और अगर फ़िलिस्तीनी पक्ष इस मामले में पीछे हट जाता है और अरब व इस्लामी जगत इस पर चुप रहता है तो फिर इस योजना को पेश करके इसे लागू कर दिया जाए। अलबत्ता अगर सामयिक दृष्टि से यह समीक्षा भी की जा रही है कि ट्रम्प ने महाभियोग से बचने और भ्रष्टाचार के आरोप में नेतनयाहू को जेल जाने से बचाने के लिए अपनी योजना इस समय सार्वजिक की है लेकिन यह समीक्षा, पिछले दो बरसों में डील ऑफ़ द सेंचुरी के ख़िलाफ़ फ़िलिस्तीनियों और अरब व इस्लामी देशों की प्रतिक्रियाओं के दृष्टिगत उचित नहीं लगती।

 

डील ऑफ़ द सेंचुरी के अंतर्गत ट्रम्प ने एक बार फिर वर्ष 1967 की सीमाओं में फ़िलिस्तीन देश के गठन के संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों की अनदेखी करते हुए कहा है कि बैतुल मुक़द्दस, ज़ायोनी शासन की राजधानी के रूप में मान्यता हासिल है। इसके अलावा भी इस योजना में फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ कई अहम बिंदु हैं। इस योजना का एक आर्थिक आयाम भी है और वह यह कि अगर फ़िलिस्तीनियों ने इस योजना को मान लिया तो कुछ देश (संभावित रूप से सऊदी अरब व संयुक्त अरब इमारात) उन्हें 50 अरब डाॅलर देंगे। फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों के बारे में ट्रम्प की योजना में कहा गया है कि इस समस्या को इस्राईल के बाहर हल किया जाना चाहिए यानी, शरणार्थियों की स्वदेश वापसी की कोई संभावना नहीं है।

 

ट्रम्प की इस योजना के इन अहम बिंदुओं पर ध्यान देने से कुछ बातें स्पष्ट हो जाती हैंः

  • पहली बात तो यह कि यह योजना एकपक्षीय रूप से इस तरह तैयार की गई है कि इससे ज़ायोनी ख़ुश हो जाएं।
  • दूसरे यह कि इसमें संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद के सभी प्रस्तावों की अनदेखी की गई है जिसमें 1967 की सीमाओं के अंदर पूर्वी बैतुल मुक़द्दस की राजधानी वाले फ़िलिस्तीनी देश के गठन संबंधी प्रस्ताव नंबर 242 भी शामिल है।
  • तीसरे यह कि इसमें फ़िलिस्तीनी शरणार्थियों की स्वदेश वापसी के अधिकार की अनदेखी की गई है जिनकी संख्या इस समय 50 लाख से ज़्यादा है।
  • चौथे यह कि इस योजना में यह स्पष्ट नहीं है कि फ़िलिस्तीनी देश कब और किस क्षेत्र में गठित होगा। इसका निर्धारण एक अमरीकी व इस्राईली समिति करेगी और इसमें फ़िलिस्तीनियों की कोई भूमिका नहीं होगी।
  • पांचवीं बात यह कि उस समिति में, जिसमें फ़िलिस्तीनियों की कोई भूमिका नहीं है, सीमाओं के निर्धारण का मतलब यह है कि ज़ायोनी शासन के विस्तारवाद का कोई अंत नहीं है और अगर फ़िलिस्तीनी  इस योजना को स्वीकार भी कर लें तब भी समय बीतने के साथ इस बात की प्रतीक्षा करनी होगी कि वे डील ऑफ़ द सेंचुरी पर भी संतुष्ट नहीं होंगे और फ़िलिस्तीनी क्षेत्रों पर अवैध क़ब्ज़ा जारी रखेंगे जैसा कि इस्राईल ने अब तक सुरक्षा परिषद के किसी भी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है और फ़िलिस्तीनियों व इस्लामी जगत की उचित प्रतिक्रिया के अभाव के चलते अपना विस्तारवाद जारी रखा है।

 

अब आते हैं फ़िलिस्तीनियों व अरब देशों की प्रतिक्रिया की तरफ़। इस बारे में भी कुछ बिंदु ध्यान योग्या हैं।

  1. ऐसा लगता है कि सऊदी अरब, संयुक्त अरब इमारात, ओमान और बहरैन पहले ही इस योजना पर सहमत हो चुके हैं जैसा कि मुहम्मद बिन सलमान ने इस योजना के कुछ बिंदुओं की तरफ़ पहले ही इशारा कर दिया था जिन्हें अब ट्रम्प ने सार्वजनिक किया है।
  2. फ़िलिस्तीनी प्रशासन के प्रमुख महमूद अब्बास ने इस योजना का विरोध करते हुए कहा है कि बैतुल मुक़द्दस बिकाऊ नहीं है और उन्होंने अवैध क़ब्ज़ा ख़त्म करने के लिए प्रतिरोध की रणनीति पर बल दिया। अगर अब्बास समझते हैं कि प्रतिरोध का मतलब सिर्फ़ प्रदर्शन और राजनैतिक वार्ता है तो यह रणनीति कभी सफल नहीं होगी और दसियों साल से दुनिया देख रही है कि इस प्रकार के प्रतिरोध का कोई नतीज नहीं निकला है।
  3. इस समय फ़िलिस्तीनियों के सशस्त्र प्रतिरोध को वैधता भी हासिल है क्योंकि अमरीका व ज़ायोनी शासन, संयुक्त राष्ट्र की योजनाओं से हट कर काम कर रहे हैं और फ़िलिस्तीनियों के न्यूनतम अधिकारों को भी पैरों तले रौंद रहे हैं इस लिए अपने अधिकारों की बहाली और ज़ायोनी शासन को पीछे हटाने के लिए सशस्त्र प्रतिरोध फ़िलिस्तीनियों का मान्य हक़ और एकमात्र रास्ता है। (HN)